काव्य : ये कैसा सवेरा मेरे देश का है
ये कैसा सवेरा मेरे देश का है।
न खुशियां न वादे न संकल्प जागे
क्यों विकृत हुआ रूप विश्वास का है
ये कैसा सवेरा मेरे देश का.है।
जो कल तक हमारे अहसास में था ,
वो फूलों का आंगन कहीं खो गया है ,
चमन में जो भंवरे निडर घुमते थे ,
कहीं आज उनका अमन सो गया है ,
न जाने कहाँ से ये उमड़ी 'घटायें ',
दिलों में अँधेरा ये किस रात का है
,ये कैसा सबेरा मेरे देश का है ,।
चुनौती समय ने तुम्हे आज दी है ,
नियति की लकीरों ने आवाज दी है ,
नभयभीत होकर पराजित बनो तुम ,
ये दहशत की रातों में एक त्रासदी है ,
मिटा दो अँधेरा जो आतंक का है ,
ये कैसा सबेरा मेरे देश का है ,।
जब आतंक बढ़ता हो अपने चमन में ,
हवाओं को दोषी बताओगे कैसे ?
जब अपने ही घर में विभीषण पले हों ,
तो सोने की लंका जले फिर न कैसे ?
चलो ,एकता की रंगोली सजाएँ -
जो तूफां से डर जाये परवाज क्या है ?
ये कैसा सबेरा मेरे देश का है ,।
- पद्मा मिश्रा जमशेदपुर:
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बहुत सुंदर रचना , समसामयिक परिवेश का चित्रण
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