आषाढ़ी अमावस्य का महत्व
भारत की सनातन हिन्दू संस्कृति में प्राचीन काल से ही हर दिन का अपना महत्व है ।उसके पीछे हमारे ऋषि-मुनि जो अपने समय के महान शोधकर्ति वैज्ञानिक थे उन्होंने अपनी तपस्या एवं व्यवहारिक जीवन में इसे अनुभूत कर तब कहीं इस रहस्य को सभी के समक्ष लोककल्याण के लिये प्रकट किया पहले यह श्रुति के रूप में हमारे समक्ष आये बाद में स्मृति के द्वारा भोजपत्रों पर उनके शिष्यों के द्वारा लिखा गया ।
आज हम आषाढ़ मास जिसका प्रारंभ चंद्रमा के उत्तराषाढा नक्षत्र से ही होने के कारण इसका नाम आषाढ़ मास हुआ ।आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या का कृषि प्रधान देश में अपना विशेष महत्व है । इसे हलहारिणी अमावस्या भी कहते हैं । जेठ की तपती धूपके बाद बरखा की बूंदे जब धरती को सजल- सरस करती हैं तो खेतों में किसान उस गीली मिट्टी पर हल चलाने के पूर्व आज के दिन नहा धोकर अपने उन सभी कृषि उपकरणों को निकाल कर उनको भी स्वच्छ करके सबसे पहले उनका पूजन करता है । पूजन करते समय वह ईश्वर से प्रार्थना करता है कि हमारे इन उपकरणों को प्रभू इतनी शक्ति दे की हम इनकी सहायता से अपने खेतों में धनधान्य की फसल उत्पन्न कर सकें ।हमारे खेत हरियाली से हरहराकर धन-धान की वर्षा करें जिससे हम सबका जीवन सुखी हो । हलहारिणी का अर्थ ही है हल काआहरण करते हुये उससे खेतों की जुताई करने के पश्चात बोवनी करें । कृषि प्रधान देश में पहले हल-बैल से ही खेती होती थी । किसान बैल का अपने पुत्र के समान पालन करता हुआ उसे हल में जोतता था।खेतों मे भी बैलों के थक जाने पर उनको चारा भूसा खिलाकर पानी पिलाता तब स्वयं भोजन करता । बैल भी किसान की आज्ञा का पुत्रवत पालन करता उसे अपने स्वामी से विशेष स्नेह होता ।आज की तरह बोलों को वह कसाई खाने कभी नही भेजता । आज आधुनिक उपकरणों ने कृषि का भी औद्योगिकीकरण करते हये उसे भीएक उद्यैगबना दिया अब कृषि उपकरण में हल-बैल की नहीं ट्रैक्टरों की पूजा होती है। जिसमें मानव की मानवीय भावनाओं का कोई मूल्य नहीं वह भी मशीनों के साथ ही मशीन हो गया । आज भीगांव में किसान इस परम्परा का निर्वाह करते हुये खेत में बीज बोने के पूर्व खेत की माटी और कृषि के आधुनिक उपकरणों का पूजन कर कृषि कार्य का प्रारम्भ करते हैं। समय परिवर्तन शील और समय के साथ ही उसके उपकरण भी ।
अमावस्या पितरों केलिये भी समर्पित है ।अत:जनमानस किसी पवित्र नदी या सरोवर में स्नान कर पितरों को तर्पण अर्पित कर तृप्त करते हुये उनका आशीर्वाद लेते हैं ।आज के दिन शनिदेव को प्रसन्न करने के लिये पीपल वृक्ष के पूजन का भी विधान है ।
- उषा सक्सेना भोपाल
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