काव्य :
आओ पितर और पुरखों आओ
आओ पितर और पुरखों आओ,
पुण्य धरा पर स्वागत है l
श्रद्धा भाव से जो अर्पण है,
प्रेम भाव से तुम भी पाओ l
ऊँगली थाम चलना सिखलाया,
जीवन को तुमने धन्य बनाया l
छोड़ हमें सुरधाम गए तुम,
लेकिन भूले नहीं तुम्हें हम l
पितृ पक्ष में तर्पण करते,
यथा योग्य हम दान भी करते l
दान दक्षिणा देते पंडित को,
भोजन सुस्वादु जिमाते l
श्रद्धा सुमन समर्पित है तुमको,
आशीर्वाद सदा तुम देना l
सुखी और समृद्ध रहें हम,
कृपा दृष्टि ऐसी तुम रखना l
भूल चूक जो हुई हो हमसे,
संतति जान क्षमा कर देना l
पितरों सदा नमन है तुमको,
सिर पर आशीष बनाये रखना l
- बिन्दु त्रिपाठी, भोपाल
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