काव्य :
भाषा-गीत
भाषा मेरे पास नहीं है
श्रीराम निवारिया
आँखें सबको मिली हुईं हैं
भाषा सबको मिली नहीं है
धरती तो है हर एक की
रस्ता सबको मिली नहीं है
बिल्ली सपना देख रही है
चूहे कितने सारे हैं
आराम कर रहे सबके सब
बाहर बिल के कोई नहीं है
आमों की डाली पर कोयल
आती चुपके-चुपके है
आम चोंच के पास लगे हैं
पर रखवाला, खड़ा यहीं है
बिल्ली बनी कलेक्टर है
तितली, गौरैयों के बीच
फरमाया, चूहे बाहर आएँ
रखवाला क्यों अंदर है।
मेरी बातें व्हाट्सएप पर
चुन्नू-मुन्नू लिख दो तुम
देख रही हूँ सब, आँखों से
पर भाषा मेरे पास नहीं है।
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