ad

काव्य : भगवत गीता चतुर्थअध्याय-दिव्यज्ञान -रानी पांडेय , रायगढ़ छत्तीसगढ।


 काव्य : 

भगवत गीता चतुर्थअध्याय-दिव्यज्ञान


सर्वप्रथम कृष्ण ने दिया ज्ञान 

समस्त लोको के राजा,प्रभुत शक्ति   

धारी सूर्यदेव विवस्वान को ,

विवस्वान ने मनुष्य पितृ मनु को,

मनु ने इक्ष्वाकु को।

ज्ञान के रचयिता ईश्वर, 

वाहक भी वहीं हैं ,

परम्परागत तरीके से करते वहन

भक्त ज्ञान की इस थाली का ।

परम्परा प्रणाली टूटने से 

टूटता है ज्ञान डाली का ।

भ्रम और पाप बढ़ जाता

बढ़ जाता धरती पर अधर्म, 

अर्जुन के जरिए दिव्य ज्ञान ,

को पुन:स्थापित करते प्रभु, 

दिव्य ज्ञान :भगवान कौन हैं?

जीव कौन?दोनों का सम्बंध क्या?   

 अपनी इच्छानुसार आध्यात्मिक

 रूप में लेते जन्म,जीव भोगता  

 भौतिक रूप मे अपना कर्म ।

प्रभु जानते अगला- पिछला,  

जीव विस्मृत कर जाता सारा, 

जब जब अधर्म बढ़ता, 

लेना पड़ता जन्म दुबारा ।

मानव के लिए जरूरी ज्ञान

गुरु ही खोले इसका पिटारा।

जैसे कृष्ण ने धर दिया ,

अर्जुन के समक्ष सारा का सारा

जो जिस रूप में प्रभु से जुड़ता 

उसी रूप में गति पाता है ,

भौतिक सुख मांगता,सुख पाता

भक्ति मांगता ,भक्ति पाता।

ईश्वर एक ही हैं, देवता अनेक ,

ईश्वर ने रचा जीव और देव

यज्ञ -देव इच्छाओं की 

पूर्ति के साधन है। 

वर्णाश्रम के रचयिता विष्णुजी 

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र,की,

था गुणों पर बंटा समाज 

आस्था और अर्थ पर,

अलग थलग अब का समाज 

शोषण कहाँ फिर भी कम है?

कृष्ण कहते अपने प्रिय से,

कर्म, विकर्म और अकर्म मे 

अकर्म करो हे अर्जुन। 

अर्जुन ने  कहा-प्रभु 

दिव्य ज्ञान कैसे पाऊं?

तुम तक मै कैसे आऊं?

प्रभु मुस्कुराए हँसकर बोले

बुद्धिमानी नही चारित्रिक

पात्रता, पाता वही जो खोता,

चरित्र बढ़ता तपोबल से ,

ब्रह्मचारी की तप इन्द्रियों 

को भगवान में खोने से, 

गृहस्थ का तप कर्म फल 

से गृहस्थ की देखभाल 

और प्रभु नाम मे खोने से। 

अर्जुन ने पूछा-मै इन परिस्थतियों 

मे क्या त्याग करूँ?

ज्ञान कैसे अपने अंदर भरूॅ ।

सबसे बड़ा त्याग"अहंकार"है कुरू,

गुरू का हाथ थामकर,अलग 

परिस्थितियों मे सही कर्म चुनो,

आस्थावान ही दिव्य ज्ञान लेता है     

 मेरे प्रेम का अधिकारी वही होता है।

ज्ञान रूपी शस्त्र से संशय को मार दो,

खुद को ही नही धर्म को भी तार दो।


- रानी पांडेय , रायगढ़ छत्तीसगढ।

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

Post a Comment

Previous Post Next Post