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आदित्यपुर साहित्यकार संघ ने अपने संस्थापक अध्यक्ष को नमनांजलि दी


 आदित्यपुर साहित्यकार संघ ने अपने संस्थापक अध्यक्ष को नमनांजलि दी

जमशेदपुर ।।आदित्यपुर साहित्यकार संघ ने अपने प्रथम अध्यक्ष स्मृतिशेष आदरणीय बच्चन पाठक सलिल जी के अवतरण दिवस पर आयोजित एक आनलाइन आयोजन में उन्हें नमन करते हुए श्रद्धा सुमन अर्पित किया। इस अवसर पर उनकी स्स्मृतियों को संजोने के.लिए स्मारिका भी प्रकाशित हो रही है .जिसका लोकार्पण अक्टूबर में होगा।इन विशिष्‍ट पलों को जीवंत करते हुए  वर्तमान अध्यक्ष पद्मा मिश्रा ने भावप्रवण वक्तव्य से उनकी स्मृतियों को सदस्यों से साझा किया"--

पतझड में झर जाते पत्ते. शाखें रह जाती हैं

कुछ भी शेष नहीं रहता.बस यादें रह जाती हैं।

कुछ यादें आजीवन नहीं मिटती .और मन पर कहीं गहरे अंकित हो जाती हैं। मैने उन्हें एक श्रेष्ठ साहित्यकार के रुप में भी देखा है और एक वात्सल्य स्नेह लुटाते अभिभावक के रुप में भी"

सलिल स्मारिका के संपादक, कवि.कथाकार  मनोज पाठक आजिज ने अपनी स्वरचित कविता के माध्यम से अपने गुरुजी को याद किया-काव्य शिल्प के शिल्पी गुरुवर जन्म दिवस पर श्रद्धा सुमन .रस, अलंकार, छंद के तरुवर 

आपसे महका साहित्य उपवन। कथा, कविता, निबंध रचकर कथ्य गरिमा बढ़ाई है ।

आपने कितने हाथ पकड़कर रचने की कला सिखलाई है। 

वरिष्ठ कवयित्री आरती श्रीवास्तव ने अपने शिक्षक के रुप में उन्हें काव्यजलि दी--'

संस्था की वरिष्ठ सदस्या आनंद बाला शर्मा ने उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व की चर्चा करते हुए उन्हें एक समर्पित. वरेण्य और साहित्य मर्मज्ञ साहित्याकार एवं सहज. सरल. सौम्य व्यक्तित्व का भनी बताया।।

नगर की लोकप्रिय चिकित्सक एवं कवयित्री आशा गुप्ता ने आदरणीय सलिल जी की रचना का पाठ कर अपने गुरुदेव को अपना स्नेहिल नमन अर्पित किया-भोर शरद की ..उत्तर रही है .धीरे धीरे.आओ शरद सुहागिन आओ"।सह संपादक.कवयित्री कथाकार एवं सदस्य डा मीनाक्षी कर्ण की प्रस्तुति थी आदरणीय सलिल जी की रचना 'मिट्टी का पुत्र -जिसको उन्होने अत्यंत सुन्दर स्वरों में प्रस्तुत किया।--मै गमले में नहीं उगा हूं किसी वाद के ..नहीं किसी माली की सेवा मैने ली है"।अगली प्रस्तुति के रुप में कविवर सलिल जी के ज्येष्ठ पुत्र एवं संस्था के कोषाध्यक्ष रंजन पाठक ने भी अपने पिता की रचना का पाठ कर उन्हें नमन किया--"सेवा धर्म- रात चांदनी छत मे बोला .चंदा मामा से यों बोला.लेकर तारों की बारात. कहां निकल जाते हर रात...मै अपना धर्म निभाता हूं.सबको राह दिखाता हूं'।इन काव्यात्मक प्रस्तुतियों ने सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया.। आदरणीय सलिल जी की प्रिय पुत्री. कवयित्री.कथाकार तथा सह संपादक सुस्मििता मिश्रा सलिलातमजा ने भोजपुरी रचना का पाठ किया--

जब हमार लागेला ध्यान..लौकेले श्री कृष्ण भगवान. मुरली बजावेले.स्नेह छलकावेले. तब लागेला हमरा ई मन.बन गईल बा वृंदावन 

संस्था की सदस्य श्वेत लता ने भी अपनी स्वरचित कविता प्रस्तुत की--बहुत कठिन होता है किसी कवि की

कागज पर उकेरना उनकी छवि. 

साहित्य के सृजन में जिसने अमिट छाप है छोड़ी, 

सखा बन ह्वेनसांग के संग जगे रात भर और कहा, 'बुद्धं शरणम् गच्छामि'।समादृत साहित्यकार स्व सलिल जी के कनिष्ठ पुत्र राकेश पाठक जी की प्रस्तुति ने सभी को भाव विभोर कर दिया-अपने  यशस्वी पिता द्वारा रचित  बाल कविता "हम भारत के बाल सिपाही .आगे बढते जायेंगे।मंजिल कितनी भी ऊंची हो.उस पर चढते जायेंगे।

भिवाडी राजस्थान से वरिष्ठ कथाकार रेणुका अस्थाना ने भी अपने भावोद्गार अर्पित किये तो नगर के वरिष्ठ साहित्यकार दिनेश्वर प्रसाद सिंह दिनेश. बीरेन्द्र ओझा..मनीष वंदन. प्रभाष झा.मीरा झा.डा रत्ना मानिक आदि ने भी भावांजलि दी ।

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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