काव्य :
मेरा गाँव तब और अब
कैसा बदला रूप गाँव का,
सब कुछ धुंधला धुंधला लगता!
चाल चलन औ चेहरे बदले
हर कोई नेता जैसा लगता!!
सरजू बाँधे पगड़ी चलते
रोशन जी अब टोपी संग!
राम लाल जी चले लपेटे
गले जनेऊ अपने अँग!!
सबकी अपनी अपनी बस्ती
अलग अलग है उनका झंडा!
नेता सबके अपने अपने
जैसे सबके अपने पंडा!!
जबसे सड़के घुसी गांव मे
पनघट सब सूने से दिखते!
संझियारे का ढोल मजीरा
भूले बिसरे किस्से लगते!!
ननद भौजाई का वह पनघट
भूली बिसरी बातें होती!
कुआँ हो गया सरपंच का
बैठ वहां अब घातें होती!!
आज नेता जी फिर आएँगे
रामू का घर सजा हुआ है!
अल्लादीन गाँव से गायब
जाने कहां पर छुपा हुआ है!!
नहीं रही अब वह समरसता
जाने कहाँ सम्बन्ध खो गए!
लगता था परिवार गाँव का
क्या थे हम अब क्या हो गए!!
- सुरेश गुप्त ग्वालियरी
विंध्य नगर बैढ़न
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