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काव्य : दशानन की व्यथा - विकास उपाध्याय ,इटारसी


 काव्य : 

दशानन की व्यथा   


मैंने कोई कसर छोड़ी 

धर्म को जीत दिलाने में? 

सुत खोये अपनों से बिछड़ा

तज दिया अनुज विभीषण भाई

भ्राता अपने बलिदान किये 

श्रीराम की विजय गाथा में। 

समूचे कुल को झोंक दिया

खुद ही अपयश पाया मैने

धर्म ध्वजा फहरा ही दिया 

तजा प्राण अपना मैने।

अहंकार मन में पाले 

अनगिनत रावण यहां घूम रहे।

बेटी बहन अबला से कर कुकर्म 

अपराधों को चूम रहे।

हर साल जलाकर के मुझको 

चैन इन्हें ना आता है।

जिस मातृभूमि में जन्मे पले-बढ़े

उसका आँचल लहूलुहान करे।

जय जननी जय मातु भवानी

क्यूँ कर उसका कल्याण करे।

बीस नयन द्रवित मन मेरा 

दस शीष झुकाए बैठा हूँ।

मैं दुष्ट हृदय अहंकारी 

अतिक्रोधी प्रलयंकारी

मुझसा ना बनो मुझसा ना करो

यह आस लगाए बैठा हूँ।

चलाओ तीर करो वध मेरा

मैं तुममे समाए बैठा हूँ।

चलाओ तीर करो वध मेरा

मैं तुममे समाए बैठा हूँ।

         -   विकास उपाध्याय ,इटारसी

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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