काव्य : जिंदा रावण घूम रहे
हम तो पुतले फूँक रहे हैं ।
पर जिंदा रावण घूम रहे हैं।
पर यह सोचो राम कहाँ हैं ?
उस के जैसा काम कहाँ है ?
मृग - मारीच पहन कर चोला,
सीता को फिर लुभा रहे हैं।
हम तो पुतले फूँक रहे हैं।
पर जिंदा रावण घूम रहे हैं।।
अब सीता का मान कहाँ है ?
सीता की पहचान कहाँ है?
थी घर की चौखट लाँघी सीता ने,
पर हम मर्यादा लाँघ रहे हैं।।
हम तो पुतले फूँक रहे हैं ।
पर जिंदा रावण घूम रहे हैं।।
कहते मन का रावण मारो,
किंतु राम से गुण तो धारो !
सभी जानते हैं रावण को,
फिर क्यों जिंदा घूम रहे हैं?
हम तो पुतले फूँक रहे हैं।
पर जिंदा रावण घूम रहे हैं।।
जिसने सीता का किया हरण था,
वह दसों सिरों वाला रावण था।
ये दसों इंद्रियाँ वश में न थीं,
"मैं" ने उसके प्राण लिए हैं ।।
हम तो पुतले फूँक रहे हैं ।
पर जिंदा रावण घूम रहे हैं।।
- सरोज लता सोनी ,भोपाल
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