काव्य :
शरद चंद्र
चंद्रमा उगते पूर्णिमा निशा में
सोलह कलाओं से हो आवृत्त;
आश्विन मास की रात्रि पूर्णिमा
चंद्र करें मानस को प्रभावित।
पूर्णिम अंबर तले रात जागरण
कोजागिरी नृत्य गोपियां करतीं;
पनघट पर पनभरनियां हैं जातीं
रजत गागर अमृत छक भरतीं।
कोजागिरी की रजत निशा में
सोलह कलाओं से चंद्र युक्त हैं;
महा रास करें निधिवन,बरसाने
कृष्ण-सखी नृत्य रत उन्मुक्त हैं।
पूर्णिम चंद्र किरण औषधि है
कर लो चंद्र दर्शन बन चातक;
तपन तृषा विषाद मिट जायेंगे
बैठ सुखासन करो तप त्राटक।
करो आराधना हरि-लक्ष्मी की
करो आराधना शिवेंदु चन्द्र की;
करो आह्वान अश्वनी कुमार के
करो आराधना पूर्णेंदु भद्र की।
जल हीम तत्व किरण रजत हैं
धवल शुभ्र गुण दुग्ध में मिश्रित;
हविष्य अन्न चावल शर्करा संग
गुणकारी होता खीर परिष्कृत।
प्रकृति रुप औषधि बन जाता
नीर क्षीर पय चंद्र आयुष रुप;
वातज कफ फुफ्फुस रोग में
खीर उपचार चंद्राहुत अद्भुत।
मंत्र जाप करो एक माला भर
'ओम् नमो नारायणणाय' की;
करो आराधना शरद चंद्र की
श्रद्धान्वित हो पारायण की।
-अंजनी कुमार'सुधाकर' , बिलासपुर

