खामोश रास्तों की
सुन पुकार,
चाँद भी आ गया
बाम,
बस थोड़ी झिझक
बाकी है
चंद कदमों की
दूरी नापनी है,
बुझ न जाँए कहीं
रौशनी के दीपक सारे,
चले भी आओ कि
ख्वाब जागते पुकारे।
ढलने लगे हैं रात के साए,
अपने में सिमटने लगे
हैं सितारे भी सारे,
धीरे-धीरे रजनी भी
लगी है सिमटने,
कहीं चाँद भी धैर्य
खोकर,
सागर में न डूबकी
लगा ले,
आजा के चाँदनी
पुकारे।
साँसें हवाओं की
थमने लगी हैं,
भागती-दौड़ती सड़कें
भी ठिठकने लगीं हैं,
खामोशियाँ दे रहीं हैं
सदाएँ,
हौले-हौले हाथ
हिलाकर शाखाएँ भी
बुला रहीं हैं,
आ के अब तो
रात भी जाने को है
सुन ले न अपने
दिल की पुकार।
- डा.नीलम ,अजमेर
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काव्य

