काव्य :
अधूरी मोहब्बत
लो सुना ही दूँ
दास्तां
अपनी अधूरी
मोहब्बत की,
भटक रही है जो
दरिया-ए-चनाब की
उफनती लहरों में
उब-डूब कर रही है,
सोहनी-महिवाल-सी।
तड़प रही पूर्णता को
प्यार में इकदूजे की
परछाईं बन,
सहराओं में पानी
की बूँद को
तरसते,तड़पते
रब से फरियाद करते
हाथों में थामें हाथ,
अधूरे ख्वाब लिए
मौत के आगोश में
सोए लैला मजनूँ-सी।
अधूरी मोहब्बत
की चीखें आज भी
बुल्लेशाह की
हीर में सुनाई देती है,
गोरखनाथी राँझे
की बाँसुरी की धुन
मर्सिया गाती घूमती है पंजाब की वादियों में।
क्या-क्या बयां
करुँ जख्में दिल के
किस्से,
मिर्जा-सा तड़प रहे हैं
उस ऊँची तन्हा
पहाड़ी पर,
अपाहिज बनकर,
जहाँ स्वं साहिबा ने
तीर थे उसके तोड़ फेंक
दिये थे,
कभी शशि-पुन्नू की तरह
सहराओं की तपती
रेत में नंगे कदम
ढूंढते रहे अपनी अपनी
अधूरी मोहब्बत को।
सच जहां कहाँ,कब
मुकम्मल हुआ है?
किसी को
जिंदगी मिली मगर
प्यार नहीं मिला है।
तड़प है हर किसी को
किसी चीज की,
आदमी ही कब आदमी
का सगा हुआ है।
- डा.नीलम ,अजमेर

