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काव्य : भगवत गीता-अध्याय ग्यारह : विराट रूप - रानी पांडेय , रायगढ़ छत्तीसगढ


 काव्य : 

भगवत गीता-अध्याय ग्यारह 

विराट रूप 


परम गुरु कृष्णा मधुसूदन 

देवकीनन्दन मुरलीधर ,

परमज्ञान से दूर हुआ अर्जुन का मोह ,

विश्वरूप दिखाने विनती करे करजोड़ 

कालांतर में ना फंसे छल में इंसान,

अर्जुन के जरिए दिया ईश्वर ने प्रमाण। 

जब कृष्ण ने विश्वरूप दिखाया,

अर्जुन को दिव्य चक्षु थमाया, 

चर अचर सब था समाया,

हजारों सूर्य सा तेजमय रूप ,

देवी देवताओं और प्रकृति का 

अनंत विस्तार, तीनों लोक के

अद्भूत और विकराल रूप से,

गांडीव धारी, देवता भयभीत ,

पांडवों के सिवा सब योद्धा रणभूमिके 

विश्वरूप के प्रज्वलित मुखमेंसमारहें,

लहू की धार मुख से बहते देख

भयभीत सव्यसाची ने पूछा-

इस उग्ररूप का प्रयोजन क्या प्रभु?

कृष्ण सर्वभक्षी रूप में कहें "काल हूँ "

तुम निमित्त मात्र इस युद्ध के ,

मेरी इच्छा के सहयोगी बनो,

युद्धकरो,यशप्राप्ति,सम्पन्नता भोगो।


प्रभु प्रसन्न होते भक्तो के गुणगान से

युद्ध समापन पर युधिष्ठिर ग्लानि से

है भरे हुए,सिंहासन पर ना बैठने पर

अड़े हुए, कृष्ण ने दिया सुझाव  

क्यूॅ ना भीष्म पितामह से पूछा जाए?

संसार के खेल रचने वाले भक्तो के 

मान के लिए क्या क्या रचा करते हैं 

पितामह के यश के लिए 

सगे संबंधियों संग अंतिम दर्शन ,

हस्तिनापुर से रणभूमि में जाते है। 


भगवान को मित्र जानकर अतीत के

व्यवहार पर अर्जुन लज्जाते है।

भयभीत अर्जुन के स्थिर चित 

के लिए पहले चतुर्भुज,

फिर दो भुज रूप मेआते है।

सिर्फ भक्ति से ही भक्त,

इस रूप के दर्शन पाते है ।

"मेरी इच्छानुकूल कर्म करो",

यही कृष्ण समझाते है। 


 - रानी पांडेय 

रायगढ़ छत्तीसगढ ।

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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