व्यंग्य :
'जलवेदार जलेबी बाई'
सुबह-सुबह भंडारे की मुफ्त की गरमा - गरम जलेबी खाने के बाद जैसई पेट गुर्राया तो मास्टर जी सकते में आ गए, लगा महापाप हो गया। बीस साल से नियमपूर्वक चल रहा एकादशी का व्रत अनजाने में टूट गया। स्कूल पहुंचे तो हताशा और निराशा में मन पढ़ाने में नहीं लगा, अंदर उपवास टूटने का अपराध बोध पसर गया। दो बच्चों को गुड्डी तनवा दी, तीन को घुटने के बल खड़ा किया और दो बच्चों के पिछवाड़े में छड़ी चला दी। बीस साल का एकादशी के उपवास में मुफ्त की जलेबी ने कबाड़ा कर दिया। हेड मास्टर को आते देख अनमने मन से पढ़ाने लगे, छड़ी उठाई मेज पर पटकी, श्याम पट को डस्टर से पीटा और कहने लगे - नियमपूर्वक उपवास करने की आदत डाली जाय तो खाये हुए भोजन का विकार दूर हो जाता है। स्वास्थ्य को बहुत लाभ होता है मन में शान्ति रहती है। एकादशी का उपवास हमेशा करना चाहिए, एकादशी करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है कभी विष्णु जी प्रसन्न हो जाते हैं तो मुफ्त में जलेबी पोहा खिलाकर परीक्षा ले लेते हैं जैसे उन्होंने आज मेरी परीक्षा ले ली।परीक्षा में जो फेल हो जाता है उसका मन विचलित हो जाता है। घर की औरतों को तो विष्णु जी माफ करते रहते हैं घर की औरतें एकादशी व्रत में रोटी नहीं खातीं, दूध मलाई, खीर, कलाकंद, पकौड़े आदि से पेट भरतीं हैं तब विष्णु जी को बुरा नहीं लगता। इसलिए उपवास बिना आहार के ही होना चाहिए और तभी उपवास का सही अर्थ होता है। अभी भी उपवास का मतलब किसी विद्यार्थी को समझ नहीं आया हो तो हाथ उठाओ !
मास्टर जी__ उठो छकौड़ी उपवास पर कोई सवाल पूछो?
छकौड़ी - - मास्साब.... हमारे पापा नवरात्रि में नौ दिन निर्जला उपवास करते हैं पर साल के बाकी दिन- रात दारू पीते हैं ये उपवास है कि अंधविश्वास ?
मास्टर जी - - ये आस्था का मामला है जिसकी जिसमें आस्था। समझा देना उनको। बहुत साल पहले एक बार एक पार्टी वालों ने राजघाट पर कुछ घंटों के उपवास का आयोजन किया था, कुछ लोग पेट भर छोले भटूरे खाकर राजघाट पहुंच गए, गांधी जी कुछ बोलते नहीं क्योंकि गांधी जी के उपवास का उपहास उड़ाने में नेता लोग सबसे आगे हैं। मीडिया उपवास और जलेबी, मंगौड़े को अब रोजगार से जोड़ लेती है और इस बहाने टीवी में दंगल चला कर विज्ञापन से खूब पैसा बटौर लेती है। हम सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश बनने का भले नाटक करें पर चुनाव के समय कभी चौकीदार, कभी पकौड़े मंगौड़े तो कभी जलेबी मुख्य मुद्दे बन जाते हैं।
मास्टर जी - अच्छा कमल तुम खड़े होकर बताओ कि गांधी जी सही में उपवास करते थे ?
कमल - - सर जी, गांधी जी ने दक्षिण अफ्रीका से उपवास की प्रेक्टिस कर ली थी, वे अन्याय का विरोध करने अकेले उपवास रखते थे उन्होंने उपवास को हथियार बना लिया था, पर वो एकादशी का उपवास नहीं रखते थे। गांधी जी नकली दांत लगाते थे इसलिए उनको उपवास रखने में सुविधा होती थी वे अकेले उपवास में बैठते थे आजकल के नेता अकेले उपवास करने में डरते हैं। गांधी जी दिखाने के लिए उपवास नहीं करते थे पर आजकल के नेता दिखाने और फोटो खिंचवाने के लिए उपवास का नाटक करते हैं।
मास्टर जी _ भुन्नू तुम बताओ कि इन दिनों जलेबी के खूब चर्चे क्यों चल रहे हैं ?
भुन्नू _ सर जी, हमने तो अभी तक जलेबी देखी भी नहीं है,हम लोग गरीबी रेखा के नीचे के आदमी हैं, कभी घर में जलेबी आयी ही नहीं, क्योंकि दद्दा के पास कभी पैसे रहे ही नहीं।
मास्टर जी __ चलो अच्छा बैठ जाओ। गप्पू तुम बताओ कि आजकल सब तरफ सबके मुंह में जलेबी ही जलेबी क्यों छाई है ?
गप्पू __ सर जी, हमारे बाबू कभी कभी बाजार के दिन गुड़ की जलेबी लाते थे,बारह भाई बहन थे तो जलेबी के कारण घर में झगड़ा हो जाता था, अम्मा एक एक टुकड़ा सबको देती थी, ऊंगली चाटना पड़ता था। सर, आजकल सबके मुंह में जलेबी लार टपकाने का काम इसलिए कर रही है क्योंकि ये राजनैतिक जलेबी हो गई है, वोट कमाने और वोट काटने के काम आ रही है ये जलेबी....
मास्टर जी - - और कोई कुछ पूछना चाहता है जलेबी और उपवास के बारे में ?
कमल - - सर जी... सुनने में आया था कि अन्ना जी के साथ कई लोग उपवास में बैठे थे और कोई अरविंद पीछे से अन्ना जी की धोती का कांच खोल देता था। सब कई दिनों के भूखे थे तो सत्ताधारी पार्टी ने सहानुभूति पूर्वक डण्डे खिलाने का जुगाड़ बनाया था पर एक बाबा डण्डे खाने की जगह सलवार कुर्ती पहनकर मंच से कूद गया था और रामलीला मैदान के सामने चाट के ठेले में पकौड़ा के आर्डर दे दिया था। क्या ये सही है ?
मास्टर जी - - जो सुना है वो सही होगा मीडिया ने भी दिखाया था। और किसी को उपवास के बारे में पूछना हो तो हाथ उठाएं ?
नरेंद्र - - सर जी... उपवास करने वाले को चाय पिलाने पर पुण्य मिलता है कि पाप ?
मास्टर जी - - पुण्य ही मिलता होगा तभी तो चाय बेचने वाला कहां से कहां पहुंच जाता है पुण्य मिला तभी तो उसके अच्छे दिन आये......
गंगू और मंगू मुर्गा बनके सब सुन रहे थे। अब गंगू की बारी थी, गंगू से कहा गया कि उपवास के बारे में कुछ बताये.....
गंगू - - सर जी... हमारी मम्मी करवा चौथ का उपवास रहती है जब चांद निकलता है तो चलनी से पापा का चेहरा देखना चाहती है पर पापा चांद को देखकर भावुक हो जाते हैं पुरानी प्रेमिकाओं पर कविता पढ़ने लगते हैं, मम्मी नाराज हो जातीं हैं चलनी तोड़ देतीं हैं रात भर ऊधम होता है और बड़बड़ाती हुई कहतीं है कि इनका खानदान ही खराब है इनकी गुजराती बुआ रात भर चलनी लिए भूखी प्यासी छत पर खड़ी रहती है और फूफा हर करवा चौथ को विदेश का दौरा निकाल के भग जाते हैं, ऐसा लगता है जैसे फूफा ने दाढ़ी का उपवास रख लिया है कि जब बुआ मरेगी तब दाढ़ी कटेगी.. वाह रे फूफा तुमने मिट्टी के जलते कलश के सामने दांपत्य जीवन के निर्वाह के वचन दिये थे उसमें भी घोटाला कर दिया, तुम पर कैसे विश्वास करें भले तुम झटके मार मार कर खूब सपने दिखाते हो.......
छुट्टी की घंटी बज गई, मास्टर जी की छड़ी उठ गई..........जाते-जाते मास्टर जी ने हिदायत दी कि किसी से बताना नहीं कि आज हमने मुफ्त में गरमागरम जलेबी खाई और मीडिया में चल रहे जलेबी विचार विमर्श को देखकर खाईं, मोहल्ले में जलेबी का भंडारा चल रहा है दिन भर से ...तो झटके में खा ली...ये अलग बात है कि बीसों साल पुराना एकादशी व्रत टूट गया। अब पाप उनको लगेगा जो जलेबी जलेबी चिल्ला रहे हैं।
-जय प्रकाश पाण्डेय ,जबलपुर

