काव्य :
शरद पूर्णिमा'
शरद पूर्णिमा लेकर आती, ढेरों शुभ सौगात।
इन्दु रश्मियां करतीं इस दिन, अमृत की बरसात।
लक्ष्मी जी का जन्म दिवस यह,करता सब पर नेह।
देता सुख सौभाग्य सभी को, भरता खुशियां गेह।
आज रात को वृंदावन में, कृष्ण गोपियों संग।
रास रचाकर यमुना तट पर, करते सबको दंग।
मधुर मुरलिया से अपनी वह, भरते मीठी तान।
मंत्र मुग्ध कर देते सुर नर, उपजाकर मृदु गान।
आते हैं यह रास देखने, नभ से सारे देव।
चंद्र कलाओं से सजकर विभु, करते हर्षित रेव।
रोके जाते जब शिव जी तो, धरते नारी रूप।
गोपी बनकर इस लीला का, करते अमर स्वरूप।
इस गोपी के सँग फिर मोहन, पाते हैं आह्लाद।
रास रचाते अब भी इस दिन, छूने को शिव पाद।
आओ हम इस खास दिवस पर, करें प्रेम बौछार।
अपनों के उर को छूकर के ,बरसायें रसधार।
खीर बनाकर छत पर रखकर, भरकर इसमें सोम।
खायें इसको प्रियजन के सँग, पाने को सुख व्योम।
- रजनीश मिश्र 'दीपक' खुटार शाहजहाँपुर उप्र

