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कहानी :आकांक्षा – लतिका जाधव , पुणे



कहानी :  

आकांक्षा 

 – लतिका जाधव

          कालेज की भीड़ से रोशनी अपनी सखियों के संग निकल रही थी। तभी सामने से और सखियां  आ गई। सभी लड़कियां परेशान सी लग रही थी, उनकें मन  में अजीब से उतार चढ़ाव हो रहे थे। परीक्षाओं का यह दौर आसान नहीं था। सभी लड़कियां परीक्षा से जुड़ी बातें करती हुई घर जाने के लिए बस स्टैंड पर आ गई। ग्रेजुएशन के बाद आगे क्या करना है, उस बारे में उनके सबके रास्ते अलग अलग थे। एक आम छोटे से गांव से आगे बढ़ने के लिए वे सब अपनी अपनी पहल ढूंढ ही रही थी। रोशनी ने सबको कहा, “ मैं अपने भाई जो शहर में नोकरी करते हैं, वहां जानेवाली हूँ। वहाँ कोई नया कोर्स करूंगी”। सब लड़कियां सुन रही थी कि, आकांक्षा उनमें से एक बोल उठी, “मैं भी सरकारी नौकरी के लिए कोई कोर्स करूंगी” रोशनी और सभी लड़कियों ने उसका हौसला बढ़ाते हुए कहा, “वाह!क्या बात है”। बातें करते करते अब परीक्षा के तनाव से  सभी मुक्त सी हो रही थी। बस के आते ही कुछ  जगह पाकर तो कुछ खड़ी रहकर बस में सवार हो गई।

आकांक्षा के पिता सदानंद जी स्कूल में शिक्षक थे। जिससे उनका परिवार शिक्षा और आधुनिक विचारों से जुड़ गया था। सदानंद जी का व्यक्तित्व भी सादगी और सरलता से भरा था। आकांक्षा और महिमा दो बेटियां,पत्नी और मां जिनके साथ उनका जीवन खुशहाली से बस गया था। बेटियों को  पढ़ाना, खेलकूद से लेकर हर तरह की प्रतियोगिताओं के लिए   प्रोत्साहित करना जो वह हमेशा करते रहे। दोनों बेटियां भी अपने भविष्य को लेकर गंभीर थी। अपने करियर को लेकर पिता से बातें किया करती थी। आकांक्षा ने तो वह सरकारी नौकरी के लिए कोशिश करेगी यह पहले ही साफ कर दिया  था। महिमा तो अभी दसवीं की परीक्षा दे चुकी थी, उसकी विज्ञान मे रूचि थी।

रात के खाने के बाद आकांक्षा ने सरकारी नौकरियों के लिए मुंबई मे जो कोचिंग सेंटर थे, वहां जाने की बात पिता से कही। मुंबई में आकांक्षा की मौसी थी, वहां जाकर वह पढ़ने का सोच रही थी। मां अपनी बहन से पहले ही बात कर चुकी थी।उसने आकांक्षा को आने के लिए कहा भी था। सदानंद जी भी स्कूल से छुट्टी लेकर आकांक्षा के साथ मुंबई जाने के लिए तैयार हो गए।

गर्मी के दिनों में मुंबई को झेलना गांव के लोगों को मुश्किल हो जाता है। आकांक्षा को कोचिंग सेंटर में एक छोटे प्राथमिक कोर्स के लिए सदानंद जी ने दाखिल करा दिया था। पहले उस माहौल को समझना जरूरी था।यदि ठीक लगता है तो सोचेंगे,बस यही बात आकांक्षा को समझाकर वह आकांक्षा को मौसी के पास छोड़ कर घर वापस आ गए।

पिता के जाने के बाद, मौसी आकांक्षा को गले लगाकर बहुत भावुक हो गई थी। “कुछ दिन के लिए क्यों न हो, मेरे घर में बेटी की जो कमी थी, पूरी हो गई” मौसी की इस बात से आकांक्षा भीग उठ़ी । उसने उस रात मौसी के परिवार से खूब बातें की, मौसी के स्कूल में जानेवाले दो बेटें और बिजनेस में डूबे मौसा जी भी आकांक्षा से मिलकर खुश हो गए थे। रात में सोते हुए आकांक्षा के आंखों में सपनें थे,नयी उड़ान के सपने।

सुबह पांच बजे  कर्कश अलार्म ने उसको जगा दिया। वह थकान महसूस कर रही थी लेकिन उसको भी तैयार होकर आज से ही कोचिंग सेंटर जाना था। वह उठकर बाथरूम में गई। बाहर आकर अपने बैग से जरूरी चीजों को निकाला। तभी मौसी की आवाज आई। “बेटी इधर किचन में आना” वह दौड़कर वहाँ गई।

मौसी ने उसकी तरफ़ देखकर कहा, “अभी दोनों भाई भी स्कूल के लिए तैयार हो जाएंगे। एक बरतन लेकर हम सबके लिए चाय रख देना बेटा” वह लपककर चाय का बरतन और मौसी का कहा मानकर रसोई में हाथ बंटाने लगी।

स्कूल बस दोनों को लेकर चली गई। अब आठ बज गए थे। आकांक्षा नहा धोकर तैयार हो गई। मौसी ने एक नाश्ते की प्लेट उसके लिए ढंककर रखी थी। उसने देखा मौसी पड़ोसन से बातें कर रही थी। उसने ठंडे पड़े ब्रेड बटर को हल्के गर्म दूध में डूबोकर निगल लिया। जल्दी से बैग उठाकर निकली। आगे चौक में बस स्टैंड था। वहां से कोचिंग सेंटर के लिए बस थी। वह समय गंवाने के लिए बिल्कुल भी तैयार न थी। वह मौसी के पास जाकर बोली, “मैं जा रही हूं” मौसी  वार्तालाप को बिना रोकें हाथ हिलाकर,सिर हिलाकर उसको अलविदा कर दी।

चौक में उसने देखा अभी भीड़ जुटी नही थी। उसकी 98 नंबर की बस कोचिंग सेंटर तक जानेवाली आ गई थी, वह फुर्ती से बस मे चढ गई। उसको पता था, मुंबई का  सफ़र फुर्ती से जुडा है। कोचिंग सेंटर में दूरदराज से उसके जैसे काफी पढ़नेवाले आये थे। वहां सभी लेक्चर्स सरकारी क्षेत्रों में उपलब्ध नौकरियों से जुड़े और जानकारी देनेवाले थे। बीच में एक छुट्टी का आधा घंटा दिया था। सब नीचे जाकर खानपान करने लगे। फिर से जानकारी भरा लेक्चर सुना। पश्चात विद्यार्थियों से कोचिंग सेंटर के डायरेक्टर का स्वागत और हौसलाअफजाई करता वार्तालाप हुआ। 

आकांक्षा को पहले दिन ही इस बात का ज्ञान हो गया था कि इस क्षेत्र में जाने के लिए हमें किस तरह से पढ़ना और अपने आप को तैयार करना होता है।आज सचमुच  बेहद अच्छी जानकारी मिली थी। अब वह जाने के लिए बस स्टैंड पर रूकी ही थी कि खचाखच लोगों से भरी बस सामने आ गई।ऐसे बस में कैसे चढेंगे? वह बस को देखती ही रही। लेकिन वहां ऐसी ही बसों का सिलसिला था जो बदलने वाला नही था। फिर कुछ महिलाओं के साथ उसने हिम्मत कर अगली बस में चढना ठीक समझा, और ऐसा ही किया।

वापस आते हुए मौसी तो  नीचे पार्किंग में ही मिल गई। उसने आकांक्षा के हाथों में घर की चाबी थमाकर कहा, “मैं बस बाज़ार जा रही हूं। आधे घंटे में आ जाऊंगी। अपने लिए चाय बनाकर पी लेना” 

आकांक्षा थके कदमों से सीढियां चढ़ने लगी। अंदर जाकर उसने हाथ मुंह धोकर गैस पर चाय के लिए बरतन रखकर पानी डाला। फ्रिज से दूध निकाला, मुश्किल से आधा कप दूध था। अब इस बात से परेशान हो गई,  यह ख़त्म हो गया तो और दूध है या नहीं। उसने गैस बंद कर दिया। पानी पीकर बिस्तर पर लेट गई।

वह मन में तय कर रही थी, इस सप्ताह जितना हो सकेगा, पुस्तकों की सूची बनाकर दुकानों पर जाना चाहिए।क्योंकि एक दिन में ही उसको यह बात समझ में आ गई कि अपना घर, अपना गांव वहां की दुनिया और बाहरी दुनिया मे बहुत फर्क होता है। मुंबई ऐसा शहर है की जहाँ आने के बाद कोई भी वापस लौट कर जाना नही चाहता  है। लेकिन मुझे तो केवल कोर्स की जानकारी लेनी है।

मौसी वापस आ गई। बच्चे भी ट्यूशन से घर आ गए थे। बच्चों की मस्ती के साथ टीवी शुरू हो गया था। 

 मौसी ने आवाज देकर कहा, “बिटिया चलो खाना गर्म करेंगे” आकांक्षा रसोई में गई ही थी कि, मौसी बोली, “अरे बिटिया, वह आटा लेना जरा, तू पराठें सेंक। मैं खाना गर्म करती हूं”

आकांक्षा ने पराठों के लिए बनाया आटा लिया। पराठें बेलने लगी। पूरे घर के लोगों के लिए पराठें बनाने के बाद वह हाथ धोकर डायनिंग टेबल पर बैठी। घर के सब खाना टीवी के सामने  बैठे खा रहे थे। मौसी टीवी सिरियल मे खो गई थी। आकांक्षा ने बचा हुआ खाना थाली में लिया। भूख मर चुकी थी। जैसे तैसे खाना ख़त्म किया। फिर अपने कमरे में जो एक छोटा सा गेस्ट रुम था।वहां रखे अपने बैग से आज का अपना काम देखकर कल के लिए मिली सूचनाओं को उसने समझ लिया। फिर मौसी से मिलने गई। बच्चे नीचे गए थे। मौसा जी भी फोन पर अपनी बातें कर रहे थे।सबसे विदा लेकर वह सोने के लिए चली आई।

दूसरे दिन वही सुबह की भागदौड़। आज उसने दोपहर में मां से बात की। वह घर लौटना चाहती है। क्योंकि उसकी तबियत ठीक नहीं है।मां को तबियत की बात सुनते ही डर लगा। उसने कहा, “मैं तुम्हारे पिताजी को कल ही भेजती हूँ।तबियत ठीक नही तो बिल्कुल रहना नही” आकांक्षा को लगा मैंने बेकार ही मां को डरा दिया है। लेकिन क्या करती। अपना घर और मौसी का घर माहौल ही अलग है। वह अच्छी है, लेकिन फिर भी मेरे लिए यह सब बर्दाश्त करना कठिन ही है

वह बस स्टैंड पर आकर महिलाओं के साथ खडी हो गई। उनके साथ बस मे चढना उतरना ही उचित था। वह घर गई तो देखा मौसी के पास कुछ महिलाएं मिलने आई थी। उसको देखकर वह पास बुलाकर पूरी जानकारी लेने लगी। आकांक्षा पहले ही थक चुकी थी। वह जाने लगी, मौसी फिर भी उसको रोकने लगी।  

आकांक्षा ने मौसी से कहा, “मौसी सरदर्द हो रहा है, मैं जाती हूँ”

मौसी को ठीक नहीं लगा। रात खाना खाने के बाद मौसी ने कहा, “ देखो, ऐसे किसी के सामने चेहरा बुझाते नही है। यहां तुम्हारे लिए कोई अच्छा रिश्ता मिल सकता है। लोगों से मिलने के बाद ही तो हमें अच्छा रिश्ता मिलेगा”

अब आकांक्षा के सब्र का बांध टूटने लगा था। लेकिन जब तक पिताजी आते नही मुझे चुपचाप बर्दाश्त करना चाहिए सोचकर बोली, “मौसी अभी तो मुझे पढ़ना है, मैं अभी शादी नही करनेवाली”

“बेटे, वर ढूंढते ढूंढते भी समय निकल जाता है। अभी से सोचेंगे तो सब समय पर हो जायेगा”

आकांक्षा इस नयी मुसीबत से वाक़िफ़ नही थी। मौसी मेरे लिए रिश्ते क्यों ढूंढ रही है?

अब वह रात सोने से पहले सब सामान पैक कर चुकी थी। कल पिताजी दोपहर तक आ जायेंगे। मुझे उनके आते ही निकलना है।  मां से फोन पर धीरे धीरे बात कर इस बात की तसल्ली हो गई की पिताजी दोपहर तक वहां आ ही जायेंगे। किसी जरूरी काम के लिए आकांक्षा को लेकर जा रहे हैं, बस इतना ही कहेंगे।

फिर वही सुबह। आकांक्षा को लगा मैं यहां आकर बंदिनी हो चुकी हूं। हर घर की सोच, जीने का तरीका कितना अलग होता है। मां और मौसी दोनों बहनों की सोच समझ में जो फर्क था, वहाँ रहने के बाद ही पता चला था।

आज आकांक्षा ने कोचिंग सेंटर मे डायरेक्टर से मिलकर अपना नाम आनलाईन के लिए रजिस्टर कर दिया। सभी साथ में पढ़नेवालों  को धन्यवाद करते हुए फिर से मिलने की उम्मीद जताई।दोपहर की छुट्टी में वह हांफती हुई बस स्टैंड पर आ गई। बस की भीड़ का डर मानों अब ख़त्म ही हो गया था। वह भीड़ को चीरकर बस में सवार हो गई।

घर आकर उसने देखा मौसी बहुत उदास हो गई थी। पिताजी आज रात जाने का टिकट लेकर आये थे। उधर से आते समय वे काफी फल, मिठाइयां और मौसी के लिए मां ने भेजी हुई साडियां भी साथ लेकर आये थे। 

पिताजी को देखकर तो आकांक्षा की आंखों में खुशी के आंसू आ गए थे। चार दिनों में बेटी का चेहरा सूख गया था। चालढाल मे थकान देखकर वह सोच में पड़ गए। उन्होंने तुरंत कहा, “बिटिया, तैयार हो जाईये। हमें जल्दी निकलना है। रास्ते जाम हो जायेंगे तो हमारी रेल छूट जायेंगी”

एक गिलास पानी पीकर, आकांक्षा अपना बैग लेकर बाहर आ गई। मौसी भौचक्की सी होकर देखती ही रह गई। आकांक्षा ने मौसी को गले लगाकर कहा, "आप सब छुट्टियों में हमारे घर जरूर आना, मैं फिर कभी आऊंगी, भाईयों को प्यार और मौसाजी को नमस्कार कहना" 

पिताजी और वह चुपचाप वहां से बाहर निकलकर रिक्शा से रेलवे स्टेशन की ओर निकल पड़े।

टिकट पहले ही बुक किए थे, रात खाने के लिए फल और खाना उन्होंने होटल से ख़रीद लिया। ट्रेन सही समय पर आ गई। पूरे सफ़र में वह दोनों चुप लेकिन निश्चिंत थे। 

आकांक्षा और सदानंद जी आने के बाद,  घर जो उदासी मे डूब गया था खिल उठा। स्कूल के लिए सदानंद जी को तुरंत तैयार होकर जाना था। जाने से पहले उन्होंने घर के सब लोगों को बड़े कमरे में बुलाया। सब खामोश और सहमे हुए थे।सदानंद जी कहने लगे, “अब हम जो हो गया, उसके बारे में कोई बात नही करेंगे। क्योंकि हमारे रिश्तेदार बुरे नही है, उनकी सोच अलग है। उनका रहन सहन हम लोगों से अलग है। हो सकता है वह भी हमारे बारे कुछ ऐसा ही सोच रहे होंगे।हमारे लिए बेटी के वह पल साहसी है,  जिनको उसने कठिनाई से जिया, उसने बर्दाश्त किया, लेकिन निर्णय लेने में देर नही दिखाई”

फिर वह जल्दी से  बैग लेकर स्कूल के लिए बाहर निकल गए।

आकांक्षा ने मां के गले लगते हुए कहा, “आपने मुझपर विश्वास किया और वापस ले आये”

मां का गला भर आया था, “ बेटी, औरत के लिए हमेशा समझदार परिवार ही उसकी सबसे बड़ी दौलत होती है। भले ही वह कहीं भी हो। रिश्तों में कमजोरियां होती है, लेकिन बच्चियों की उड़ान को रोकना तो निहायत ही नासमझी है”

आकांक्षा ने देखा महिमा भी उसको आकर लिपट गई और उसको गुदगुदी करने लगी। आकांक्षा वहां से हंसते हुए गलियारे में दौड़ी तो महिमा भी उसके पीछे भागने लगी। अब घर भी बेटियों की हंसी से  चहक उठा था।

- लतिका जाधव, पुणे (महाराष्ट्र)

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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