डुकरिया पुराण के शकुन-अपशकुन है जीवन पर हावी !
- आत्माराम यादव पीव वरिष्ठ पत्रकार
सनातन धर्म में 4 वेदों 108 उपनिषदों ओर 18 पुराणों की मान्यता है जिसकी रचना करने वालों सहित उनकी कथा आदि करने वाले व्यासपीठ धारी आचार्यों आदि का पता चलता है किन्तु अनादि काल से इन सबके बीच में लोक विश्वास ओर मान्यताओं की सामान्य दूषित प्रवृत्ति में शुभ अशुभ को केंद्र मे रखकर निषेधात्मक कार्यों की रोक टोक- कार्यान्वित किए जाने के अस्तित्व को कायम रखे जाने को महत्व दिया गया है ओर उसकी अनलिखी बातों को डुकरिया पुराण नाम दिया गया है। आप अगर पुराणों की तलाश में निकलेंगे तो प्राय सभी पुराण आपको उपलब्ध हो जाये किन्तु डुकरिया पुराण लाने में सफल नही हो सकेंगे। डुकरिया असल में किसी वृद्धा को कहा गया है जो साठ साल से ऊपर के हो चुके है। आज भी गाँव में चले जाये आपके स्थानीय भाषा-बोली में बूढ़े को डुकरा ओर बूढ़ी को डुकरिया कहने का चलन है, भावनात्मक रूप से माता पिता , दादा दादी ओर नाना नानी के लिए डुकरा- डुकरिया शब्द प्रचलित है, जिनके अपने अनुभव है भले वह सत्य की कसौटी से कोसों दूर हो हो, किन्तु उम्र का पड़ाव ओर जीवन के अनुभव से जो लोक विश्वास ओर मान्यताए पैदा होती रही, उसे हम डुकरिया पुराण का नाम देकर उसका पालन करते रहे, ओर अगर चूकवश पालन न करने पर हुये नुकसान को डुकरिया पुराण से जोड़ उसके अनादर का परिणाम मानने को विवश हुये। अतएव कहना न होगा की भले धर्मशास्त्र- वेद पुराण हमारे जीवन को शासित करे या न करे किन्तु डुकरिया पुराण हम सबके जीवन को प्रभावित किए है ओर सब पर हावी है।
कहने को तो आप पश्चिम सभ्यता के सेवक ओर उच्च शिक्षा प्राप्त सूटबूटधारी भारतीय हो या अंग्रेज़ ही क्यों न हो , जो वेद पुराण ओर शास्त्रों के कर्मकांडों पर असीम विश्वास करते हो किन्तु जैसे ही आप घर से निकलते छींक से सामना हो जाये तो तुरंत ठिठक कर खड़े हो जायोगे, फिर प्राचीन संस्कार जो डुकरिया पुराण के है उनके समक्ष खतरे की घंटी समझोगे ओर फिर तमाम तरह के उपाय ओर प्रार्थनाओं मंत्रों का जाप शुरू कर इस छींक के अपशकुन को दूर करने का उपाय करेंगे फिर अपनी यात्रा को मंगलमय का रास्ता तैयार करेंगे। छींक की ही भांति अगर बिल्ली रास्ता काट ले तो आपकी यात्रा का उत्साह भंग हो जाएगा, भले इन मौकों पर अपनी बुद्धि पर गर्व करते हो पर बिल्ली के रास्ता काटने पर किसी दूसरे की उस रास्ते को काटने अर्थात उस रास्ते से गुजर जाने के बाद ही आप आगे कदम बढ़ाते हो। जरा सी हथेली में खुजली हो तो रुपया मिलने की उम्मीद मन में जाग जाती है बाले बाद में रुपया न मिलने पर उसी हथेली को मलना पड़े, पर आप इसमें शामिल होते हो। आप जब दूसरे इस तरह करे तो उसे अंधविश्वास बताकर उसका मज़ाक मनाने में भी दो घर आगे होते हो किन्तु अपने मामले में आपकी हिम्मत नही होती की आप डुकरिया पुराण की इन मान्यताओं की लकीर पार कर सको। डुकरिया पुराण में है की नहीं पता नहीं किन्तु इसके मानने वालों ने तेरह के अंक को दुर्भाग्य से जोड़ दिया ओर इस तेरह को मृतक कि तेरहवी से जोड़कर अशुभ माना है।
भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने डुकरिया पुराण को पूरी तरह नकार दिया ओर के जीवन में तेरह के अंक को लेकर कई बाते प्रचलित है जंहा वे 13 मई 1996 को पहली बार प्रधानमंत्री बने किन्तु बहुमंत साबित न कर सक्ने के कारण 13 दिन बाद उनकी सरकार गिर गई,, दूसरी बार वे 13 महीने तक प्रधानमंत्री रहे ओर उनकी सरकार गिर गई तथा तीसरी बार वे 13 दलों के गठबंधन से 13 अक्टूम्बर 1999 को प्रधानमंत्री बने। उन्हें 13 से बचने के लिए भी कहा गया. लेकिन वाजपेयी नहीं माने और 13 अप्रैल 2004 को ही नामांकन भी भरा. 13 मई को हुई वोटों की गिनती में बीजेपी को सत्ता गंवानी पड़ी. बावजूद इन सब के अटल बिहारी वाजपेयी ने कभी नहीं माना कि उनके जीवन में कोई नंबर शुभ या अशुभ है. वह तो यूं ही अपना काम करते रहे और आगे बढ़ते रहे, जबकि अटल जी के पहले ओर बाद के लोग आज भी तेरह को मृतक की तेरहवी से जोड़कर अशुभ मानते है। यही कारण है कुछ क्षेत्र में तेरह कि संख्या अशुभ प्रमाणित रही है ओर परिणामस्वरूप जितने भी होटल व्यवसायी है वे 13 नंबर कमरे का अस्तित्व खतरे में होने तथा उसे किसी के द्वारा न लिए जाने पर उसके खाली होने के नुकसान से बचने एवं इस व्यर्थ बकवास या दुर्भाग्य से बचने के लिए 13 नंबर कमरे का नाम 12 ए आदि अपनी पसंद का रखकर 13 नंबर की अशुभता को छिपाने लगे, यही तेरह तारीख को लेकर अपवाद है। आश्चर्य होता है डुकरिया पुराण का जो भी रहस्य हो किन्तु बुद्धिवादी सहज ही बिना विचारे इन परम्पराओं को ताकत देकर इन्हे मान्यता दिये है ओर इन्ही के कारण डुकरिया पुराण की बाते तिल का ताड़ ओर राई का पहाड़ बनकर समाज को दिग्भ्रमित कर आर्थिक नुकसान का कारण बनी हुई है।
गुरुनानक के जीवन का एक प्रसंग है,वे किसी दुकान पर तौलने का काम करते थे ओर एक, दो तीन , चार गिनते हुये जैसे ही तेरह पर पहुंचे तो फिर उन्होने चौदह कहा ही नहीं। तेरह पर ही वे थम गए ओर तेरह तेरह रट लगाते तेरा तेरा उनके लिए समाधि बन गई, अर्थात मेरा कुछ नहीं सब कुछ तेरा। इससे प्रतीत होता है की गुरुनानक जी डुकरिया पुराण के हानि के अंक तेरह को रटते हुये समाधि अर्थात जीवन में अनूठा लाभ पा गए जिसे आज तक कोई प्राप्त नहीं कर सका। तेरह के अंक को गुरुनानक ने तेरा बना दिया अर्थात परमात्मा का बना दिया किन्तु हम डुकरिया पुराण के परंपराधारी आज भी तेरह को अपशकुन से जोड़कर लकीर के फकीर बने है। बंगला भाषा में छींक को हांची कहते है ओर वहाँ कहावत है कि "हांची टिकटिकी बाधा, जे न माने से गाधा।" छींक के संबंध में मैंने किसी मनोविज्ञान की पुस्तक में पढ़ा था कि वह शरीर के श्वास निकलने का प्रतीक है। इसलिए अशुभ मानते हैं। उसकी अशुभता निवारण के लिए लोग प्रभु का स्मरण करते हुए कहते है "छत्रपती । घंटे पाप, बड़े रती ।" यही नहीं अपने यहाँ तीन की संख्या विषमता की प्रतीक होने के कारण अशुभ मानी जाती है। शिवजी का तीसरा नेत्र भी प्रलयंकर है। तीन रोटियाँ या पूड़ियाँ एक साथ नहीं परसी जातीं। हीन रोटियाँ यदि परसनी हो तो एक के दो टुकड़े कर दिये जाते हैं। सम संख्या में विशेष कर चार की संख्या में पूर्णता, एकसा और संतुलन का भाव आ जाता है। वैसे पाँच और सात पवित्र माने जाते हैं, कहीं-कहीं तीन भी पवित्र माना जाता है; जैसे पूजा पाठ आराधना के समय आचमन तीन ही वार किया जाता है।
डुकरिया पुराण के फेर में भारतीय ही नहीं अपितु अंग्रेज़ भी रहे है इसलिए अंग्रेजी में तेरह की संख्या अनिष्टकारिणो मानने का कारण बताया जाता है कि प्रभू ईसा मसीह शूली लगने के पूर्व अपने बारह शिष्यों के साथ एक मेज पर खाने बैठे थे । वे तो पकड़ ही लिये गये थे और निर्दोष होते हुए भी शूली पर चढ़ा दिये गये थे किंतु जिस शिष्य ने उनको पकड़वाया था उसने भी ग्लानिवश आत्महत्या कर ली थी- दुहरा खून ! फिर आदमी क्यों न सचेत हो ? अंग्रेजों में लकड़ी छू लेना शुभ और अनिष्ट-निवारक समझा जाता है। क्योंकि प्रभु ईसा मसीह की सूली लकड़ी की थी। नमक का गिरना शायद इस कारण अशुभ माना जाता है कि नमक वहाँ जीवन के रस या आनंद का प्रतीक समझा जाता है। अपने यहाँ मी नमक को रामरस कहते हैं। नमक के बिना सब चीज फीकी पड़ जाती है। उसका गिरना जीवन के रस के नष्ट होने का चिह्न माना जाता है। अपने यहाँ पंचकों में मरना अशुभ माना जाता है। इसमें किसी का कोई वश नहीं, और यात्राएँ तो निश्चित शुभ मुहूर्त देखकर की जा सकती है किंतु परलोक की यात्रा शुभ समय देखकर नही की जाती। इतिहास में इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त भीष्म पितामह को छोड़ दिया जाये तो कोई भी अपनी मर्जी से मृत्यु का समय वरण नहीं कर सका है। पंचकों में मरने के संबंध में यह विश्वास है कि यदि कोई इन नक्षत्रों में मरे तो घर में पाँच आदमियों के मरने की बौर संभावना रहती है। इसके बचाव हेतु विकल्प के लिए कुशों के अथवा आटे के पाँच पुतले बनाकर रख दिये जाते हैं किंतु इससे अभीष्ट का शमन होता है या नहीं, यह निश्चित नहीं कहा जा सकता है।
मनुष्य के जीवन का सामान्यीकरण पर विशेष महत्व है ओर सारे वैज्ञानिक नियम ही सामान्यीकरण पर निर्भर होते है और वह सामान्यीकरण सब उदाहरणों की गणना पर नहीं होता। एक बार भगवान् कृष्ण को चौथ का चंद्रमा देखने के कारण स्यमंतक मणि की चोरी का मिथ्या कलंक लगा था। इसकी कथा इस प्रकार है- एक बार ब्रह्माजी ने गणेश चतुर्थी का व्रत रखा था। चंद्रमा ब्रह्माजी की चतुर्मुखी विकृत्त आकृति पर हँसा था। ब्रह्माजी का कोपभाजन बनकर उसको शाप लगा था कि जो कोई चंद्रमा को देखे वह कलंकी हो। किंतु बहुत अनुनय-विनय करने पर वह शाप गणेश चतुर्थी के लिए सीमित हो गया था । गोस्वामी तुलसीदास जी ने इसका उल्लेख किया है "तो पर नारि लिलार गुसाईं । तजिय चौय चंदा की नाई।" एक कारण यह भी संभव हो सकता है कि चौथा चंद्रमा अनिष्टकर होता है, इसलिए चौथ का चंद्रमा भी अनिष्टकर समझा जाने लगा । इसके दोष के परिहार के लिए दूसरों के घर में पत्थर फेंककर गालियों का आह्वान करते हैं। भगवान् कृष्ण ने तो अपना कलंक पुरुषार्थ द्वारा मिटाया और उनको उसका फल भी अच्छा मिला। भले ही आपके जीवन में बिल्ली के रास्ता काटने में दो-एक-चार अनिष्ट हुआ हो, जिसे आपने एक सामान्य नियम बना लिया। ऐसे उदाहरणों पर हमारा ध्यान कम जाता है जब विल्ली के रास्ता काटने पर भी अनिष्ट न हुआ हो। प्रभू ईसा मसीह के वारह शिष्यों के साथ भोजन करने का एक ऐतिहासिक उदाहरण है। उसका सामान्यीकरण कर उसे व्यापक बना लिया गया है और तेरह की संख्या ही अशुभ मान ली गई है तथा शुक्रवार को ईसा मसीह की मृत्यु हुई थी इसलिए ईसाई लोग शुक्रबार को नयां काम आरंभ नहीं कर शुक्रवार को अपशकुन मानते है।
शकुन ओर अपशकुन डुकरिया पुराण के प्रमुख अंग हैं। शुभ शकुन एक नया उत्साह पैदा कर देते हैं। कुछ वस्तुएँ; जैसे गाय और बछड़ा विशेषकर दूध पीता हुवा बछड़ा शकुन माना जाता है ओर गाय अपने यहाँ पवित्र मानी गयी है और समृद्धि की भी प्रतीक है। भरा घड़ा भी पूर्णता और सफलता का प्रतीक है तथा स्त्रियाँ कौवे के उड़ जाने अथवा घर की दहलीज पर कांव कांव करने को मेहमान के आने का शकुन मानती है। पुरुष के दाहिने अंग का फड़कना शुभ मानते हैं और स्त्री के वामांग का । अपशकुनों का साहित्य में कई स्थानों पर उल्लेख हुआ है जिसमें कमल लाने के अर्थ श्यामसुंदर के कालीदह में कूदने पर नंद और यशोदा को अपकुशन दिखायी दिये थे। यह स्नेह आधिक्य के कारण बढ़ी हुई शंका का फल था और यह शंका नितांत अकारण भी नहीं थी । डुकरिया पुराण की सभी बातें बुद्धिवाद के विरुद्ध नहीं हैं। कुछ का कारण हम नहीं जानते, उनके कारण की खोज करनी चाहिए। कारण की खोज चाहे हम न कर सकें किंतु जातीय मनोवृत्तियों और परंपराओं के अध्ययन के ये अच्छे साधन है। बहुत-सी बातों का महत्त्व प्रतीकात्मक होता है; जैसे, भरे घड़े शुभ माने जाते हैं। वे पूर्णता और समृद्धि के प्रतीक होते हैं। इसीलिए शुभ अवसरों पर कलश की स्थापना होती है। दूर्वा भी वृद्धि का प्रतीक होने के कारण मंगल की सूचक होती है। यात्रा के समय दधि और मिष्ठान्न खाते हैं, खटाई नहीं, इसलिए कि शायद खट्टा खाने का मुहावरा सार्थक न हो जाए। डुकरिया पुराण के मान्य शकुन ओर अशकुन के लिए आवश्यक है की आप अपने मन कपाट खुले रख बुद्धिमानी से काम ले ताकि आम जीवन में अपवाद के रूप में प्रचलित ये लोक विश्वास के सभी तरह के प्रसंग कोरी कल्पना न लगे, बल्कि उसके हर पक्ष का ज्ञान ओर जानकारी होना जरूरी है। भारतीय संस्कृति की एकता को आलोकित करते ये लोक विश्वास के ज्ञात अज्ञात तथ्य का अध्ययन उतना ही महत्वपूर्ण है जितना अन्य ग्रंथ ओर पुराणों का है, तभी डुकरिया पुराण आपकी बौद्धिकता की कसौटी की परख कर सकेंगे, इसे आप कतई अपने विरुद्ध न समझिएगा।
- आत्माराम यादव पीव वरिष्ठ पत्रकार
श्री जगन्नाथ धाम काली मंदिर के पीछे, ग्वालटोली
नर्मदापुरम मध्यप्रदेश मोबाइल 9993376616

