काव्य :
गोवर्धन पूजा
*गोवर्धन न रहा नग वन उपवन*
*सब खोद बनाये बजरी कंकर;*
*कर रहे परिक्रमा कृष्ण स्मृति*
*बना कर मूल भावना खंडहर।*
*सब भूल गए मर्म मर्यादा को*
*विस्मृत कर दिए धर्म धारणा;*
*रम गये कर्म कांड के थोथे में*
*न रखे संज्ञान में मूल भावना।*
*चौराहे बाजार बजाते डफली*
*पर्यावरण चिंतन रक्षण करने;*
*हैं स्वयं काट रहे हरे वृक्षों को*
*पर्वत के पत्थर से महल गढ़ने।*
*गोवर्धन महात्म्य सिखाने को*
*कभी कृष्ण दिखाये थे लीला;*
*रोता है हृदय हाय दुर्दशा देख*
*गोवर्धन नग बना पत्थर टीला।*
*सूखे जल स्रोत वनाली सुंदर*
*न रही पशु चारे की हरियाली;*
*न रहे वन जीव आवास नीड़*
*करते व्याल उलूक हैं रुदाली।*
*हम समझ सके न धर्म मर्म*
*योगेश्वर कृष्ण की गीता को;*
*कर रहे नष्ट जीवन के स्रोते*
*भागवत के भाव पुनीता को*।
*हे श्री कृष्ण हमें क्षमा करना*
*बन सके न हम पार्थ सरीखा;*
*हम उठा न सके गांडीव पुनः*
*हम समझ सके न मर्म गीता।*
*गोवर्धन की पूजन सतत चले*
*त्योहार न केवल नैमित्तिक हो;*
*नग वन जल स्रोत की करें रक्षा*
*कर्तव्य समष्टिक वैयक्तिक हो।*
*कर्तव्य समष्टिक वैयक्तिक हो।।*
*जय श्री योगेश्वर श्री कृष्ण!*
*जय गौवर्धन पर्वत!*
*जय गोधन!*
-अंजनी कुमार'सुधाकर' , बिलासपुर

