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काव्य : गोवर्धन पूजा - अंजनी कुमार'सुधाकर' , बिलासपुर


 काव्य : 

गोवर्धन पूजा


*गोवर्धन न रहा नग वन उपवन* 

 *सब खोद बनाये बजरी कंकर;*

  *कर रहे परिक्रमा कृष्ण स्मृति*

   *बना कर मूल भावना खंडहर।*


*सब भूल गए मर्म मर्यादा को* 

*विस्मृत कर दिए धर्म धारणा;*

*रम गये कर्म कांड के थोथे में* 

*न रखे संज्ञान में मूल भावना।*


*चौराहे बाजार बजाते डफली* 

 *पर्यावरण चिंतन रक्षण करने;*

  *हैं स्वयं काट रहे हरे वृक्षों को*

   *पर्वत के पत्थर से महल गढ़ने।*


*गोवर्धन महात्म्य सिखाने को*

*कभी कृष्ण दिखाये थे लीला;* 

*रोता है हृदय हाय दुर्दशा देख* 

*गोवर्धन नग बना पत्थर टीला।*


*सूखे जल स्रोत वनाली सुंदर* 

 *न रही पशु चारे की हरियाली;*

  *न रहे वन जीव आवास नीड़* 

   *करते व्याल उलूक हैं रुदाली।*


*हम समझ सके न धर्म मर्म* 

*योगेश्वर कृष्ण की गीता को;*

*कर रहे नष्ट जीवन के स्रोते* 

*भागवत के भाव पुनीता को*।


*हे श्री कृष्ण हमें क्षमा करना* 

 *बन सके न हम पार्थ सरीखा;*

  *हम उठा न सके गांडीव पुनः*

   *हम समझ सके न मर्म गीता।*


*गोवर्धन की पूजन सतत चले*

*त्योहार न केवल नैमित्तिक हो;*

*नग वन जल स्रोत की करें रक्षा* 

*कर्तव्य समष्टिक वैयक्तिक हो।*

*कर्तव्य समष्टिक वैयक्तिक हो।।*


*जय श्री योगेश्वर श्री कृष्ण!*

*जय गौवर्धन पर्वत!*

*जय गोधन!*

   

-अंजनी कुमार'सुधाकर' , बिलासपुर

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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