काव्य :
"दोहे"
"लाना नित्य निखार"
प्रात काल के योग से, दूर रहें सब रोग।
गुणकारी गुरु मंत्र सा, संजीवन रस योग।।
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जीवन को सुंदर बना, करके साधन योग।
वेदों की शिक्षा यही, कहते सुनते लोग।।
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एक-एक का योग भी,कहलाता है योग।
भोग हुआ जब योगमय,मिटे सभी दुर्योग।।
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सबके मन में रम रहे,रोग भोग संभोग।
जिसका जैसा योग हैं,उसका वैसा भोग।।
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जो मन चाहे भोगना, कुल वसुधा के भोग।
तन को मन में ढाल ले, मन से कर ले योग।।
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दिया हुआ भगवान का,तन सुंदर उपहार।
कृष्णम् नियमित योग से,लाना नित्य निखार।।
- त्यागी अशोका कृष्णम् ,
कुरकावली,संभल,उत्तर प्रदेश
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