काव्य :
'चलो करें हम योग'
चलो करें हम योग,स्वस्थ मन अपना करने।
भरने तन नव ओज,रोग सब जड़ से हरने।
प्रतिदिन आसन ध्यान,हमें आनंदित करते।
देकर ढेरों हर्ष,व्यथा जीवन की हरते।
आयी इक्कीस जून,हमें फिर याद दिलाने।
करिए नित व्यायाम,गगन खुशियों का पाने।
पाने को उत्कर्ष,योग सब करिए भाई।
पाने को चिर काल, जगत की स्वर्ण कमाई।
करने हैं यदि पूर्ण,हमें जीवन के सपने।
तो योगासन ध्यान,हमें होंगे नित करने।
- रजनीश मिश्र दीपक खुटार शाहजहाँपुर
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