काव्य :
अभागी माँ
सुनो
मां,तुम्हीं कर सकती हो ये
इसीलिए तुम्हारे पास आया हूं
नहीं पुत्र
मुझसे ना होगा
तुम जानते हों ना
सभी पुत्रों में तुम मुझे सर्वाधिक प्रिय हो
कैसे जिंदा रहूंगी बिन आत्मा के
तुम प्राणों से आत्मा को ले जाने की बात करते हो
मां!
पीछे से कुछ और लोगों का स्वर सुनाई दिया
देवी
इनके जन्म का उद्देश्य ही मिट जायेगा
हाय पुत्र
किस परीक्षा में डाल दिया
ठीक है
निकालती हूं इस शरीर से आत्मा को।
मांगती हूं महाराज से अपने वचन
तेरे लिए जहर का प्याला भी पीती हूं
शायद इसके बाद मैं मां ना कहलायी जाऊं
चाहें दुष्टा,कलंकिनी विश्वासघातीन
जो भी सुनने को मिले
लेकिन मै तुम्हें दुखी नहीं देख पाऊंगी
अब मेरा पुत्र शायद मुझे युगों युगों तक क्षमा ना करें
मैं मां सुनने को तरस जाऊं
लेकिन पुत्र,
तुम्हें इतनी तकलीफ में कैसे जाने दूं, वन में तुम्हारा कोमल शरीर
कुम्हला जाएगा
मां ,जब एक ऋषि मुझे बाल्यकाल में
वनों वनों ले जा सकते है
तो अब तो ,लेकिन पुत्र
मां
एक बूढ़ी मां सदियों से मेरी राह तक रही है
कितने ऋषि मुनि इंतजार में हैं मां!
जानते हो पुत्र
युगों तक कहा जाएगा
कि मैंने भरत के लिए राम को वनवास दिया
लेकिन
कोई ये नहीं जान पाएगा
कि असल में
एक अभागी मां
राम के लिए भरत को छोड़ रही है
जानती हूं
भरत ,
वो मुझे कभी नहीं स्वीकारेगा
जाओ पुत्र
आज ये लाचार मां
अपने पुत्र को यही आशीष देती है.खुश रहना
लेकिन जल्दी करना पुत्र
यहां भी एक शबरी है
जो तुम्हारे जाने पर अहिल्या(पत्थर) बनकर तुम्हारी बाट जोह रही होगी
मेरा भी इंतजार खत्म करना राम🙏🏻
उस दिन के बाद ये कैकई कभी नहीं जी
14 वर्षों तक
पल पल मरी ये कैकयी
इसी उम्मीद में टिकी
रही ये जिंदा लाश
मेरे राम आयेंगे
आयेंगे मेरे राम
आखिर वो समय भी आ ही गया
जब इन पथराई आंखों ने तुम्हें देखा,जड़वत हुई ये मां खिल गई
जब सुना,
मेरा राम आ गया
तुम आ गए राम,तुम आ गए।
आए मेरे राम,पर सिर्फ राम नहीं
अब वो पुरुषोत्तम राम बनकर लौटे थे
आ गए राम।
- मिष्टी गोस्वामी , दिल्ली
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