प्रथम पूज्य गणेश के शारीरिक स्वरूप व परिवार का भाव रहस्य !
- आत्माराम यादव पीव वरिष्ठ पत्रकार ,नर्मदापुरम
'गणेश' शब्दका अर्थ होता है- 'समुदाय अथवा समुदायों का स्वामी 'गणस्य ईशो गणानामीशो वा।' प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि गणेश जी किस समुदायके स्वामी हैं? पौराणिक व्याख्याके अनुसार वे भगवान् शंकरके भृत्योंके स्वामी माने गये हैं। मैं गणेशजी को राग-द्वेषादिरहित शुद्ध मनका प्रतीक मानता हूँ। यह मत प्रायः सभी भारतीय दर्शनों के अनुसार पाँच ज्ञानेन्द्रिय एवं पाँच कर्मेन्द्रिय इन दस इन्द्रियों के समुदाय का स्वामी माना जाता है, श्रीगणेशजी प्रत्येक मांगलिक कार्य के प्रथम देव है और उनका वाहन चूहा माना गया है। उन्होंने सोचा "ऐसे वाहनके बलपर पृथ्वी की परिक्रमा प्रतियोगिता में प्रवेश करना तथा उसमें सफलता प्राप्त करना तो असम्भव है, किंतु भगवान् शंकर परमात्मा हैं। वे विश्वात्मा हैं। सारा संसार उन्हीं का शरीर है। 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' (त्रिपाद्विभूति महानारायणोपनिषद्) अर्थात् यह सब कुछ ब्रह्म ही है, 'पादोऽस्य विश्वा भूतानि' (यजुर्वेद ३१।२) अर्थात् उस ब्रह्म या परमात्माके एक ही चरण में यह सारा संसार है। अतः भगवान् शंकर और माता पार्वती की परिक्रमा कर लेने से ही विश्वकी परिक्रमा हो जायगी"- ऐसा सोचकर उन्होंने अपने। मूषकवाहनसे ही भगवान् शंकर-पार्वती की परिक्रमा कर ली। सध्या निश्चिन्त होकर बैठे। बहुत देर बाद धीरे-धीरे अन्य देवताओंका भी प्रत्यावर्तन प्रारम्भ हुआ। किंतु प्रतियोगिता समाप्त हो चुकी थी और भगवान् शंकर के निर्णय के अनुसार विजय श्री गणेशजी के हाथ लगी। तबसे वे अग्रपूजाके अधिकारी मान लिये गये।
सनातन धर्म के सभी वेद पुराण उपनिषद आदि श्रीगणपति जी की प्रथम पूजन के प्रमाण है। तभी से प्रत्येक पूजनकी थाली में मंगलस्वरूप श्रीगणपतिका स्वस्तिक-चिन्ह बनाकर उसके ओर-छोर अर्थात् अगल बगलमें दो-दो खड़ी रेखाएँ बना देते हैं। स्वस्तिक चिह्न श्रीगणपति का स्वरूप है और दो-दो रेखाएँ श्रीगणपतिकी भार्यास्वरूपा सिद्धि-बुद्धि एवं पुत्रस्वरूप लाभ और क्षेम हैं। श्रीगणपति का बीजमन्त्र है-अनुस्वारयुक्त 'ग', अर्थात् 'गं' इसी 'गं' बीजमन्त्रकी चार संख्याको मिलाकर एक कर देनेसे स्वस्तिक चिह्न बन जाता है। इस चिह्नमें चार बीजमन्त्रोंका संयुद्ध होना श्रीगणपतिकी जन्मतिथि चतुर्थीका द्योतक है। चतुर्थी तिथिमें जन्म लेनेका तात्पर्य यह है कि श्रीगणपति बुद्धिप्रदाता हैं; अतः जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय-इन चार अवस्थाओंमें चौथी अवस्था ही ज्ञानावस्था है। इस कारण बुद्धि (ज्ञान) प्रदान करनेवाले श्रीगणपतिका जन्म चतुर्थी तिथिमें थिमें होना युक्तिसंगत हो है। श्रीगणपतिका पूजन सिद्धि, बुद्धि, लाभ और क्षेम प्रदान करता है, यही भाव इस चिह्नके आसपास दो दो खड़ी रेखाओं का है।
गणेशजी की माता हैं पार्वती अर्थात –पर्ववती, जिसका आशय है – 1 -ज्ञान, 2 -इच्छा, 3 -क्रिया-त्रिपर्व अर्थात - ज्ञान-इच्छा-क्रियारूप गणेशजी की माता हैं। पर्वत्रयका रहस्य यह है कि पर्वत्रयमें सामरस्य की प्रतिमूर्ति पार्वतीजी हैं। इन पार्वतीजी की भाँति साधकों को भी ज्ञान, इच्छा एवं क्रियारूप पर्वत्रयमें सामरस्यकी स्थिति आनेपर आध्यात्मिक जगत्के सभी मायिक बन्धनरूपी समस्त विघ्न-बाधाओंक ध्वंसरूप होने पर गणेशका जन्म होगा। अर्थात् पर्वत्रय में सामरस्य आनेपर समस्त विघ्न-बाधाये विनष्ट हो जायेंगी। पार्वतीजी द्वारा गणेशजी की जय का यही आध्यात्मिक रहस्य है। गणेशजीके पिता-गणेशके पिता हैं- 'शिव'। 'शिव' का अर्थ है-कल्याण। पिता कल्याण है और पुत्र विघ्नान्तक और कल्याणका उपस्थापक। इसका रहस्य यह है कि शिवतत्त्वकी प्राप्तिके अनन्तर साधकके साधन-मार्गकी समस्त विघ्न बाधाएँ स्वतः ही नष्ट हो जायेंगी और विघ्न-बाधाओं के नष्ट होते ही साधक को अनन्त ऋद्धियों एवं सिद्धियाँ प्राप्त हो जायेंगी। शिवत्व प्राप्त होनेपर मायिक बन्धनरूपी विघ्नोंक महाध्वंसरूप गणेशका प्रादुर्भाव है।
गणेश जी की प्रत्येक बात में ही कोई-न-कोई बड़ा तत्त्व निहित है। उनके शरीरकी मुटाईक सदृश अन्य किसी देवताके शरीरकी मुटाई नहीं दीखती। हाथीका-सा मस्तक और लम्बा स्थूल शरीर यह गणेशजीको शुभ आकृति है। उनका 'स्थूलकाय' नाम भी प्रख्यात है। बच्चे हृष्ट-पुष्ट रहें इस भावनाके प्रतीक हैं भगवान् गणपति। वे तो विशालकाय हैं, किंतु उनका वाहन मूषक अत्यन्त लघुकाय है। अन्य देवताओंके वाहन बने हैं, पशु-पक्षी; जैसे-सिंह, अश्व, गरुड़, मयूर आदि। भगवान्ने किसीको भी वाहन बना रखा हो, उस वाहनसे भगवान्को नहीं, उनके सम्पर्कसे उस वाहनको ही महत्त्व प्राप्त होता है। महामहिम भगवान् लघु-से-लघुको भी अनुगृहीत करते हैं, यही भाव भगवान् गणपतिके मूषकको अपना वाहन बनानेसे प्रकट होता है। हाथीको अपना दाँत बहुत प्यारा होता है; वह उसे शुभ्र बनाये रखता है; परंतु हाथीके मस्तकवाले भगवान् गणपतिने क्या किया है? अपने एक दाँतको तोड़कर, उसके अग्रभागको तीक्ष्ण बनाकर उसके द्वारा उन्होंने महाभारत-लेखनका कार्य किया। विद्योपार्जनके लिये, धर्म और न्यायके लिये प्रिय-से-प्रिय वस्तुका त्याग करना चाहिये- यही तत्त्व या रहस्य इससे प्रकट होता है। भगवानूको लेखनी-जैसे साधनकी आवश्यकता नहीं, वे चाहें तो किसी भी वस्तुको साधन बनाकर उससे लिख सकते हैं।
श्रीगणपति प्रणव-स्वरूप हैं। सूँड़के साथ उनके मस्तकको और हाथके मोदक आदिको एक साथ देखें तो प्रणवका रूप मिलेगा। इस प्रणवका धूमध्यमें ध्यान करते हुए तमिळ प्रदेशीय भक्तोंने औवेनामक 'विनायक आहवाळ' की रचना की थी, जिसमें योगशास्त्र तथा योगपद्धतिका वर्णन है। श्रीगणेश उमा-महेश्वरके पुत्र हैं। उनको 'भगवान्' कहनेकी अपेक्षा 'शिव-पुत्र' कहनेमें ही अधिक आनन्द आता है। किसी भी भगवद्विग्रहकी आराधना क्यों न करें, उसमें प्रथमतः हमें विघ्नेश्वर गणेशकी पूजा करनी ही होगी, तभी वह काम बिना विघ्नके सम्पन्न हो सकेगा। हमारे प्रदेशकी प्रत्येक गलीके कोनेमें विघ्नेश्वरके मन्दिर दीखते हैं। उन्होंकी प्रधान देवताके रूपमें आराधना करनेका नाम 'गाणपत्यत्वम्' है। अपने लिये चक्रकी प्राप्तिके निमित्त महाविष्णुने विघ्नेश्वरके आगे 'दोर्भिकर्ण' करके आदर प्रदर्शित किया था। 'दोर्भिकर्ण' का अर्थ होता है-हाथोंसे कान पकड़ना। विघ्नेश्वरके अनुग्रहसे जगत्के सारे कार्य निर्विघ्न सिद्ध होते हैं। हम भी उनके अनुग्रहके पात्र बनें।
मंगलमूर्ति श्रीगणेशस्वरूपका प्रत्येक अंग किसी-न-किसी विशेषता (रहस्य) को लिये हुए है। उनका बौना (ठिंगना) रूप इस बातका सूचक है कि जो व्यक्ति अपने कार्यक्षेत्र में श्रीगणपति का पूजन कर कार्य प्रारम्भ करता है, उसे श्रीगणपति के इस ठिंगने-बौने कद से यह शिक्षा ग्रहण करनी चाहिये कि समाजसेवी पुरुष सरलता, नग्नता आदि सद्गुणोंके साथ अपने-आपको छोटा लघु/छोटा मानता हुआ चले, जिससे उसके अंदर अभिमानके अंकुर उत्पन्न न हों। ऐसा व्यक्ति ही अपने कार्यमें निर्विघ्नतापूर्वक सफलता प्राप्त कर सकता है। श्रीगणपति 'गजेन्द्रवदन' हैं। भगवान् शंकर ने कुपित होकर इनका मस्तक काट दिया और फिर प्रसन्न होनेपर हाथीका मस्तक जोड़ दिया, ऐसा ऐतिहासिक वर्णन है। हाथीका मस्तक लगानेका तात्पर्य यही है कि श्रीगणपति बुद्धिप्रद हैं। मस्तक ही बुद्धि (विचारशक्ति) का प्रधान केन्द्र है। हाथीमें बुद्धि, धैर्य एवं गाम्भीर्यका प्राधान्य है। वह अन्य पशुओंकी भाँति खाद्य-पदार्थ को देख पूँछ हिलाकर उखाड़कर नहीं टूट पड़ता; किंतु धीरता एवं गम्भीरता के साथ उसे ग्रहण करता है। उसके कान बड़े होते हैं। इसी प्रकार साधकको भी चाहिये कि वह अपने आसपास के सभी लोगों की बात सुनते समय धीरता एवं गम्भीरता के साथ विचार कर निर्णय ले जैसा की गणपति जी करते है और जो इसका अनुसरण करता है वह व्यक्ति अपने कार्यक्षेत्रमें आगे बढ़कर सफलता प्राप्त कर यश सम्मान भी पाता हैं।
श्रीगणपति 'लम्बोदर' हैं। उनकी आराधना से हमें यह शिक्षा मिलती है कि मानव का पेट मोटा होना चाहिये अर्थात् वह सबकी भली-बुरी बातों को सुनकर अपने पेट में रख ले; इधर-उधर प्रकाशित न करे। समय आने पर ही यदि आवश्यक हो तो उसका उपयोग करे। श्रीगणपति का 'एकदन्त' होने पर एकता (संगठन) का उपदेश दे रहे है। हम दुनियादारी में रोज देखते है जिसमें हमारे समक्ष यह कहावत बार-बार आती है जहाँ एक व्यक्ति या अनेक व्यक्तियों में बड़ी एकता गहरा सामजस्य पाया जाता है तब है कहावत अनुसार उदाहरण दिया जाता है कि ये लोग 'एक दाँत से रोटी खाते हैं।' इस प्रकार श्रीगणपतिकी आराधना हमें एकता की शिक्षा देती है। यही अभिप्राय उनको मोदक (लड्डू) के भोग लगाने का है। अलग-अलग बिखरी हुई बूँदी के समुदाय को एकत्र करके मोदक के रूपमें भोग लगाया जाता है। व्यक्तियों का सुसंगठित समाज जितना कार्य कर सकता है, उतना एक व्यक्तिसे नहीं हो पाता। श्रीगणपतिका मुख-मोदक हमें यही शिक्षा देता है जिसे हम समझ नहीं पाते है।
श्रीगणपति को सिन्दूर लगाया जाता है, उनको सिंदूर धारण करने क अभिप्राय है कि सिन्दूर सौभाग्यसूचक एवं मांगलिक द्रव्य है। अतः मंगलमूर्ति श्रीगणेश को मांगलिक द्रव्य समर्पित करना युक्तिसंगत ही है। दूर्वांकुर चढ़ानेका तात्पर्य यह है- गजको दूर्वा प्रिय है। दूसरे, दूर्वांमें नम्रता एवं सरलता भी है। श्रीगुरु नानक साहब कहते हैं- नानक नन्हें बनि रहो, जैसी नन्ही दूब । सबै घास जरि जायगी, दूब खूब-की-खूब ॥ श्रीगणपतिकी आराधना करनेवाले भक्तजनोंके कुलकी दूर्वाकी भाँति अभिवृद्धि होकर उन्हें स्थायी सुख-सौभाग्यको सम्प्राप्ति होती है। परब्रह्मरूपं गणेशं गताः स्मः ।
श्रीगणपतिके चूहे की सवारी क्यों? इसका तात्पर्य यह है कि मूषकका स्वभाव है-वस्तुको काट देनेका। वह यह नहीं देखता कि वस्तु नयी है या पुरानी बिना कारण ही उन्हें काट डालता है। इसी प्रकार कुतर्की जन भी यह नहीं सोचते कि प्रसंग कितना सुन्दर और हितकर है। वे स्वभाववश चूहे की भाँति उसे काट डालने की चेष्टा करेंगे। प्रबल बुद्धिका साम्राज्य आते ही कुतर्क दब जाता है। श्रीगणपति बुद्धिप्रद है; अतः उन्होंने कुतर्करूपी मूषकको वाहनरूपसे अपने नीचे दबा रखा है। इस प्रकार हमें श्रीगणपतिके प्रत्येक श्री अंगसे सुन्दर शिक्षा मिलती है।
गणेश के बड़े भ्राता-षडानन शिव के ज्येष्ठ पुत्र हैं। स्कन्द भौतिक तत्व से उत्पन्न हुए हैं; किंतु गणेश शक्ति के मानस-संकल्प से अभौतिक तत्त्वसे प्रकट हुए हैं। इसी कारण अग्रज होने पर भी 'स्कन्द' गणेशजी से पराजित हो गये। इसमें भी रहस्य है। भौतिकवाद कितना भी अग्रज क्यों न हो; किंतु अध्यात्मवाद रूपी अनुज से जीत नहीं सकता। स्कन्द देवताओं की सेना के सेनापति भौतिक शक्ति शारीरिक शक्ति-क्षत्रिय बल के स्वामी हैं; किंतु गणेश आध्यात्मिक शक्ति, अध्यात्मबल, बुद्धिबलके स्वामी हैं। वे बुद्धि के देवता हैं, देवों के अध्यक्ष हैं। दोनों में संघर्ष कराकर एवं गणेश की स्कन्द पर विजय दिखलाकर पुराणकारकों ने यह रहस्थार्थ प्रतिपादित किया है कि परात्पर ब्रह्म शिव के दो पुत्र हैं- एक-स्थूल एवं दो -सूक्ष्म। एक में जडता का प्राधान्य है तो दूसरे में चेतनता का। एक में शारीरिक बल की विशिष्टता है तो दूसरे में आत्मबलकी । एक विश्व की विजय अपने शारीरिक पुरुषार्थ से करने में निष्ठा रखता है तो दूसरा श्रद्धा-भक्तिसे । एक शरीरप्रधान है तो दूसरा आत्मप्रधान। ये दोनों एक ही पिताकी दो संतानें हैं, किंतु इनमें दूसरी संतान ही सदा विजयिनी होगी।
षडानन- अर्थात् पाँच इन्द्रियाँ और एक मन। भौतिक जगत् षडानन तक ही सीमित है और उसकी अन्तिम शक्ति-सेना एवं सेनापति शारीरिक शक्ति भौतिक शक्ति में प्रतिष्ठित है। देवता भोगी होते हैं, तपस्वी नहीं, अतः 'षडानन 'से परे नहीं जा सकते। 'षडानन' देवों के सुरक्षा प्रहरी हैं। देवताओं में षडानन से परे जा सकने की क्षमता नहीं, किंतु गणेश षडानन से परे हैं। वे देवों के सेनापति भौतिक शक्ति के संरक्षक प्रहरी नहीं हैं, प्रत्युत्त उनके अग्रगण्य है।
गणेश की पत्नियों के नाम हैं- पहली -ऋद्धि-सिद्धि एवं दूसरी बुद्धि है, इसका रहस्य यह है कि साधना-क्षेत्र में शिवत्व की प्राप्ति के अनन्तर विघ्नों के नाशक गणेश बनने की क्षमता आ जाती है तब सभी ऋद्धियों-सिद्धियाँ साधक के लिये स्वपत्नीवत्नी हो जाती हैं। गणेशजी की पत्नियाँ विश्वरूप की कन्याएँ हैं। इसका रहस्यार्थ निम्न है- गणेश विश्वकी समस्त नाम-रूपोत्पन्न मायात्मिका मोहिका शक्तियोंके स्वामी हैं। अर्थात् साधक जबतक नाम-रूपात्मक जगत् एवं उसकी मायात्मिका शक्तियों पर अधिकार नहीं कर लेता, तब तक वह 'ऋद्धि-सिद्धि बुद्धि' का स्वामी तथा 'क्षेम' और 'लाभ'का पिता (स्वामी) नहीं बन सकता। गणेश के पुत्रों के नाम हैं- 'क्षेम' एवं 'लाभ' है जिसका रहस्य यह है कि साधना क्षेत्र में सनातन क्षेम एवं सनातन लाभ प्राप्त करने के लिये गणेश अर्थात् शिवपुत्र बनना ही पड़ेगा; और वह शिवत्व प्राप्त किये बनना संभव नहीं तभी साधक को 'क्षेम' एवं 'लाभ' की प्राप्ति सम्भव है।
- आत्माराम यादव पीव वरिष्ठ पत्रकार
श्री जगन्नाथधाम काली मंदिर के पीछे ग्वालटोली
नर्मदापुरम मध्यप्रदेश मोबाईल-9993376616