लघुकथा :
दख़लंदाज़ी
मैं अपने मित्र से मिलने अमृतसर जा रहा था। भीषण सर्दी के मौसम में ट्रेन भी अपनी तीव्र गति से सर्द हवाओं व कुहासे को चीरती हुई, अपने गंतव्य की ओर हॉर्न बजाती हुई दौड़ी चली जा रही थी। रात देर से सोने की वजह से सुबह उठने की हिम्मत नहीं हो रही थी, लेकिन चाय वाले की कर्कश आवाज ने उठा दिया । मैंने चाय ली और जैसे ही चाय पीना शुरू किया, इतने में ही लगभग ग्यारह-बारह साल का एक लड़का मेरे सामने वाली सीट पर बैठ गया, शायद अपने परिवार के साथ देर रात गाड़ी में चढ़ा होगा। मैं उसे देखकर स्तब्ध था, कि इतने सर्द मौसम में वह आइसक्रीम खा रहा था। मुझसे नहीं रहा गया और कुछ चिंतावस मैंने सहजता से उससे कहा "कि इतनी ठंड में आइसक्रीम खाओगे तो बीमार हो जाओगे।" इस पर बच्चा पहले तो कुछ गंभीर हुआ - फिर बड़ी सरलता से मुस्कुरा कर बोला "मालूम है अंकल, मेरी दादी 104 वर्ष तक बिना कोई दवा खाए सक्रिय रहते हुए जीवित रहीं।"
उत्सुकता बस मैंने पूछा- "क्या वो भी ऐसे ही आइसक्रीम खाया करती थीं।"
बच्चे ने बड़ी ही मासूमियत से कहा - "नहीं, बल्कि इसलिए क्योंकि वो दूसरे के मामलों में 'दखल' नहीं देती थीं।"
मैं अवाक् सा उसकी ओर देखता रह गया। अत्यंत गहन, मन मस्तिष्क को अंदर तक झकझोर देने वाली सीख - जो मेरे अंतर्मन में घर कर गई। अब मेरी समझ में आ चुका था.... कि मैं इतनी शीघ्रता से जल्दी ही क्यों बूढ़ा होता जा रहा हूं, हर जगह बहुत ज्यादा बेवजह की "दख़लंदाज़ी" कर रहा हूं............! मैं इसी उहापोह में लगा हुआ था, इतने में किसी ने मेरा कंधा हिलाया तो देखा मेरा मित्र मेरे सामने खड़ा था, और गाड़ी गंतव्य पर पहुंचकर शांत खड़ी थी.....।
- मन मोहन भटनागर
झांसी-284003
(उ.प्र.)