काव्य :
निशा
निशा
सुनो
तुम रोज रात काले कपड़े क्यों पहन
लेती हो?
क्योंकि मैं निशा हूं
सुबह फ़क्क सफेद पहनती हो
क्योंकि तब मैं दिन !
शाम का क्या?
तब हमारा मिलन होता है
दिन और रात का
तब मैं दुल्हन सी सजती हूं
सूर्य को माथे की गोल बिंदी
बनाए
असमानी साड़ी में सिंदूर भरे
इठलाती हूं समंदर में देख
फिर डूब जाती हूं
चांद की आगोश में
छिटककर फिर ओढ लेती हूं
काली चादर
क्योंकि मैं निशा हूं,रजनी हूं रात्रि हूं
कितना मुश्किल होता है खुद में
अपरिभाषित रंग भरना
इसलिए
भर लेती हूं मौन का रंग
जिसमें पवन की सायं सायं
की आवाज दहला देती है
यूं ही कभी .
- मिष्टी गोस्वामी
दिल्ली
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