कविता संग्रह-"यादों के रजनीगंधा" पर चर्चा विमर्श हुआ
जबलपुर । जन सरोकार मंच टोंक (राजस्थान) द्वारा 28अगस्त 2025 को आभासी पटल पर कवयित्री संतोष श्रीवास्तव के कविता संग्रह "यादों के रजनीगंधा" पर एक सारगर्भित चर्चा-विमर्श का आयोजन किया गया।
इस अवसर पर अध्यक्ष के रूप में हमारे बीच उपस्थित रहे वरिष्ठ साहित्यकार व्यंग्यकार राजेंद्र गट्टानी ,मुख्य अतिथि के रूप में हमारे बीच उपस्थित रही वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. रानी श्रीवास्तव, विशिष्ट अतिथि के रूप में हमारे बीच वरिष्ठ साहित्यकार सरस दरबारी और वरिष्ठ साहित्यकार गोकुल सोनी की उपस्थिति रही।
कार्यक्रम के प्रारंभ में वरिष्ठ साहित्यकार श्रीमती प्रमिला वर्मा ने संचालिका डॉ भावना शुक्ल का परिचय पढ़कर उन्हें संचालन के लिए आमंत्रित किया।
डॉ भावना शुक्ल ने आत्मीय शब्दों के द्वारा साहित्यकारों का स्वागत किया और कहा विचारों का आदान-प्रदान तभी सार्थक होता है जब उसमें विविध अनुभवों और दृष्टिकोणों की सहभागिता हो। यह विमर्श गहराई से समझने का अवसर ही नहीं देगा, बल्कि नए आयामों की ओर भी ले जाएगा।
कार्यक्रम के प्रारंभ में विशिष्ट अतिथि, वरिष्ठ साहित्यकार, समीक्षक के सरस दरबारी ने "यादों के रजनीगंधा" के समीक्षात्मक दृष्टिकोण से बहुत सुंदर समीक्षा करते हुए कहा है कि यह संग्रह 185 रचनाओं का यह काव्य संग्रह यादों सपनों के बीच का सफरनामा है उन सरोकारों का सफ़र है जिसे हम सतत जूझते रहते हैं, चाहे वह स्त्री विमर्श का मुद्दा हो, सर्वहारा की त्रासदी हो या पर्यावरण की चिंता। उनकी अधिकतर रचनाएँ स्त्री विमर्श के पक्ष में बड़ी दृढ़ता से खड़ी है। संग्रह की शुरुआत ही में वे स्त्री क पीढ़ियों से छले जाने की बात करती हैं। जहाँ वह रिश्ते पूरे समर्पण भाव से निभाती रही , पर उसके हिस्से में केवल छल आया।
' किंतु मैं हूँ
काल के बंधन बंधी
इस जन्म का ऋण चुकाती।
पीढ़ियाँ दर पीढ़ियाँ
छल रही विश्वास मेरा
रीति रस में इस जहाँ की
सरस जी की सुंदर अभिव्यक्ति के संदर्भ में भावना शुक्ल ने कहा-
शब्दों में संवेदना, भावों में आभास।
कविता उनकी बोलती, रहती मन के पास...
विशिष्ट अतिथि की भूमिका में गोकुल सोनी जी ने अपने वक्तव्य के माध्यम से कहा ""यादों की रजनीगंधा संतोष जी की उल्लेखनीय काव्य कृति है जिसमें जीवन के हर रंग समाहित है। इन कविताओं को पढ़कर कभी आप स्मृतियों के जंगल में भटक जाएंगे, तो कभी जीवन के राग रंग आपका जीवन ऊर्जा से भर देंगे। कभी आप उदास हो जाएंगे तो कभी अपने आप को जीवन युद्ध के लिए कमर कसकर तैयार कर लेंगे। इस संग्रह की कई कविताएँ प्रेम पीयूष से अभिसिंचित कर संवेदना को शालीनता के साथ पन्नों पर उतर गया है।
भावना शुक्ल ने इस आधार पर कहा यह विमर्श निश्चित ही हम सबके लिए ज्ञानवर्धक और प्रेरणादायी रहा।
मुख्य अतिथि के रूप में वरिष्ठ साहित्यकार प्रोफेसर डॉ रानी श्रीवास्तव जी ने "यादों के रजनीगंधा" के संदर्भ में कहा -कि संतोष जी ने अपने एवं अपनों की संचित यादों को अनेक सुंदर बिंबो और प्रतीकों के साथ अद्भुत शिल्प और कौशल से अपनी कविताओं में उकेरा है । उनकी कविता में रस्मों में भस्म होती स्त्रियाँ हैं ,एसिड अटैक की पीड़ितों का आर्तनाद है, इतिहास में दर्ज स्याह पृष्ठ है तो सभी जख्मो से अपने को उभर कर सकारात्मक की ठोस धरातल पर खड़ी स्त्री भी है।
आपके इन्हीं भावों के आधार पर संचालिका ने कहा-ऐसी कविताएँ हमें यह सोचने के लिए विवश करती है कि समाज में समानता और न्याय का सपना तभी पूरा होगा जब स्त्री को भी उसकी गरिमा और स्वतंत्रता मिलेगी।
तत्पश्चात आज के आयोजन की उत्सव मूर्ति वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय संतोष श्रीवास्तव जी ने अपने वक्तव्य में कहा- कविताएँ मेरी ताकत है जब कभी मन शून्य में विचरण करता है कविताएँ मुझे सँभालकर मेरे कदमों को ठोस ज़मीन देती हैं।
मेरे लिए यादों के लौटने का क़लम से सृजित उत्सव है। यह जानते हुए की इस बार जब भी आएंगे तो केवल यादें नहीं होगी , हमारे रक्त, मुद्रा और भावों में घुल चुकी अनूठे शब्द में फूटकर किसी घड़ी बोल देना चाहेंगी अपने आप और खिल उठेंगे "यादों के रजनीगंधा"। कविता ख़ुद को विभिन्न कोणों से कहलवा लेती है।
उन्होंने अपनी कविता में कहा -
" मैं अकिंचन
तुम मुझे
प्रणय की रागनी
विरह के आकुल दिनों की संगिनी
तथा "पाजेब कहती है" और मुश्किल है समझना।
यह कविता सुनकर सभी ने तालिया से उत्साहवर्धन किया और भावना शुक्ल ने इस अभिव्यक्ति के साथ यह कहा की यादों की रजनीगंधा काव्य संग्रह में स्मृतियों का यह कलात्मक रूपांतरण कविता में भावनात्मक गहराई और अस्मिता भर देता है... अपने भावों को इन शब्दों में व्यक्त करते हुए कहा-
शब्दों के मोती सिये, भाव रूप भंडार।
झलक रहा है भाव में जीवन का संसार।
कार्यक्रम के अध्यक्षता कर रहे आदरणीय राजेंद्र गट्टानी ने अपने विचारों को व्यक्त करते हुए कविता संग्रह" यादों के रजनीगंधा" की रचनाओं के संदर्भ में कहा -कि रचनाओं को जब पढ़ते हैं, तो लगता है अधिकांश रचनाएँ अवसाद से जन्मी है, अंतस के उद्वेलन से और आक्रोश से जन्मी है। अधिकांश रचनाओं में वेदना है, विलाप है और व्है विवशता है । तब लगता है कि संग्रह का शीर्षक 'यादों के कैक्टस' होना चाहिए. रजनीगंधा तो ऐसा फूल है जिसकी मोहक महक में डूब कर बाहर आने को मन ही नहीं करता, तब यादों के रजनीगंधा नाम क्यों? लेकिन फिर ख़ुद ही समाधान भी मिलता है कि चिकित्सा जगत में'अरोमा थेरेपी' की जो प्रक्रिया है, उसमें रजनीगंधा का अर्क उपयोग में लिया जाता है और इस थैरेपी से तनाव और दर्द में राहत मिलती है इस नाते "यादों के रजनीगंधा" शीर्षक का औचित्य सिद्ध होता है कि संतोष श्रीवास्तव की यह कविताए उनकी यादों के रजनीगंधा का अर्क है जो सृजन उपरांत उन्हें और पाठकों को भी राहत देती है, माँ को हल्का करती है।
इस सन्दर्भ ने भावना ने कहा कि-विमर्श को सार्थक और पूर्णता प्रदान की है हमारे आपके विचार हमारे मार्गदर्शन और प्रेरणा का प्रकाश है।
कार्यक्रम के अंत में डॉ. भावना शुक्ल ने सभी का आभार व्यक्त किया .साथ ही साथ ही आभासी मंच से जुड़े श्रोताओं ने भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की उनका भी आभार व्यक्त करते हुए कहा-विमर्श वास्तव में इस कार्यक्रम की गरिमा को और ऊंचाई देगा देता है आप सभी के चिंतन ने हम सबको नई दृष्टि दी है।