लघु कथा :
दीपावली का वो अनोखा पुरस्कार
ऑस्ट्रेलिया से उनके पास फ़ोन आने पर हिचकिचाहट में उठाया, आश्चर्य "आशु- तोषु" लाइन पर मिले। जिन्होंने अपने अथक प्रयासों से "डॉक्टर साहब" को ढूंढ निकाला।
लगभग 45 वर्ष के बाद इन बच्चों का फोन आया, दीपावली की शुभकामनाएं देकर बहुत सारी पुरानी बातों को स्मरण किया । जो लगभग विस्मृत हो चुकीं थीं। स्वाभाविक मन गदगद होकर खुशियों से भर गया कोई उन्हें इतने दिनों बाद आत्मीयता से पुत्रवत याद कर रहा है।
यहां के कल्चरल डिपार्टमेंट व एसोसिएशन में कार्यरत होने से आज हम यहाँ अपने भारत व ऑस्ट्रेलिया की क्रिकेट टीम के साथ हैं तो आप लोगों की बहुत याद आ रही है।
उन्होंने अपने बचपन के मीठे क्षणों को सांझा किया-जब वे छोटे रहे व वाराणसी की एक कॉलोनी के पार्क में खेला करते । मध्यम वर्ग के सभी बच्चों की टीम उल्लास से एक पुराने बैट के साथ लकड़ियों के विकेट लगाकर किक्रेट खेलती। कॉलोनी में रहने वाले सरकारी डॉक्टर साहब भी अक्सर उनके साथ बाउलिंग व बैटिंग में हाथ आजमाते। बच्चों व बड़ों का पूरा उत्साहवर्धन होता।
दीवाली पर डॉक्टर साहब ने दो बच्चों को साथ लेकर मोटरसाइकिल से पास स्थित खेल दुकान से किक्रेट बैट, बॉल,ग्लव्स पैड सारा सामान दिलवा दिया। उनसब नन्हों के लिए स्वप्न जैसा रहा ,खुशी की सीमा न रही ,समझ न सके, परिजन न होके, कोई ऐसा कर सकता है ।
अत्यंत स्नेह से अभिभूत, कॉलोनी के बच्चों का खेल जोर शोर से नियमित प्रारंभ हो गया। वर्षों सिलसिला चला, उनके पुत्ररत्न की प्राप्ति में सबने भरपूर आनंद उठाया। समय बीतने के साथ सभी अपनी उच्च पढ़ाई-दिनचर्या में व्यस्त। समयोपरांत डॉक्टर साहब का तबादला हुआ।
पर बचपन के वो "अविस्मरणीय मधुर"----क्षण कहाँ भूलते। इतने दिनों पश्चात उच्च पदों पर पंहुचकर भी वे बच्चे मनसे डॉक्टर साहब व उनके सौहाद्रपूर्ण व्यवहार को याद कर रहे हैं,तो समझ आया, जीवन में छोटी सी खुशी भी अगर हम निस्वार्थ बाँट लें तो उसकी असीम मधुरता जीवनभर साथ रहती है। वास्तव में "दीपावली शुभ" हुई।
- अलका मधुसूदन पटेल , जबलपुर
.jpg)
