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काव्य : गीत को शृंगार दे दो - पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर


 काव्य : 

गीत को शृंगार दे दो


कल्पना को गीत का आधार दे दो

यामिनी को रुप का आभार दे दो।


शीत की ठिठुरन घुली है अब हवा में 

दिवस हैं लघु रातें लंबी सी फिजां.में

चंद्रिका जब पिघलती हो भोर नभ में 

स्वर्ण सूरज को हृदय का प्यार दे दो।


मास कार्तिक का सहज  आह्वान करता 

श्री विष्णु की अभ्यर्थना का गान करता।

दीपकों की वर्तिका में स्नेह का प्रतिदान देकर 

आज गंगा धार को स्वर्णिम लहर गतिमान देदो।


रोशनी यह पूर्णिमा के चांद सी 

चांदनी बन तुम इसे शृंगार दे दो।

भावनाओ में समर्पित स्नेह मेरा

नामित नयनों में छिपा आभार दे दो।


पर्व षष्ठी का नयी आशा जगाता

कामना का नित्य नूतन गान रचता

आज सम्मुख याचना के स्वर सजे हैं 

हे देव मन की कामना को सार दे दो।

कल्पना को गीत का आधार दे दो।


कल्पना को गीत का आधार दे दो

रागिनी को शब्द का आभार दे दो।


- पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर


देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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