लघुकथा :
बदलाव
खुले आकाश के नीचे माया और उसका भाई सोनू चटाई पर बैठे पढ़ रहे थे -अपने मिट्टी के घर के सामने। पड़ोस के घर में बँधी गाय के गले की घंटी बजती तो दोनों थोड़ी देर मुस्कुरा लेते, फिर दुबारा किताबों में डूब जाते। स्कूल तक पहुँचने के लिए तीन किलोमीटर की कच्ची सड़क थी, और कई बार बारिश में वह रास्ता बह जाता था । पिता खेतों में मज़दूरी करते थे और माँ गाँव के घरों में झाड़ू-पोंछा करती थीं।पढ़ाई के लिए बस पुरानी चटाई और पुरानी किताबें-कॉपी — मगर हौसले पूरे थे। माया को डॉक्टर बनना था। “गाँव वालों का इलाज करूँगी। किसी को भी शहर जाने की परेशानी नहीं उठानी पड़ेगी।” वह अक्सर कहती। सोनू हँस देता, और कहता“ मैं तेरे क्लिनिक के पास ही दवाइयों की दुकान खोलूंगा। जिससे गाँव वालों को दवा के लिए भटकना भी नहीं पड़ेगा।” शाम को जब उनके पिता लौटते तो देखते — लालटेन की रौशनी में भी पढ़ते रहते ।उनकी आँखों में थकान के साथ गर्व उतर आता और वे कहते-“तुम दोनों तो शहर वालों से भी ज़्यादा मेहनत करते हो,” उनकी आवाज़ में विश्वास झलकता। उसी गाँव के दूसरी ओर धनाढ्य घरों के बच्चे नशे की आदतों में लिप्त निरर्थक बहस करते रहते थे । कोई कहता— “यहाँ कुछ नहीं बदलने वाला।” कोई दूसरा बोल उठता“ यहाँ गाँव में अच्छी पढ़ाई के लिए सुविधाएँ ही नहीं है ।” एक दिन उनकी ऐसी ही बातचीत के चलते सामने से माया और सोनू गुजरते हुए दिखाई दिये — हाथ में किताबें, आँखों में उम्मीद लिये! उन युवकों की बातचीत थम गई और तभी किसी ने धीरे से कहा “शायद बदलाव इन्हीं से शुरू होता है।”
- नीता श्रीवास्तव श्रद्धा , भोपाल
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