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राम ध्वज के नीचे जन्म लेता नया भारत -प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)


 राम ध्वज के नीचे जन्म लेता नया भारत

[राम मूल्य और मोदी संकल्प: ‘गुलामी-मुक्त भारत’ रोडमैप]

[मैकॉले की परछाई से राम राज्य की ओर: भारत का नया रोडमैप]

 प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)

    अयोध्या की सुबह, सरयू की लहरों के साथ जैसे राम की वापसी का गान गा रही थी। सूरज की पहली किरण मंदिर के शिखर पर पड़ रही थी, और वहां खड़े थे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी— साधारण वेश में, लेकिन आंखों में अटूट संकल्प लिए। हाथों में 22 फुट ऊंचा 'धर्म ध्वज', भगवा रंग (सूर्य, 'ओम' और कोविदार वृक्ष का प्रतीक) में लिपटा, जैसे राम के न्याय, त्याग और सत्य का प्रतीक है। जैसे ही ध्वज हवा में लहराया, लाखों दिल धड़क उठे। यह क्षण केवल एक उत्सव नहीं था; यह था गुलामी की जंजीरों को तोड़ने का बिगुल।

मोदी जी की आवाज, शांत लेकिन गरजती हुई, बोली: "सदियों पुराने घाव अब भर रहे हैं।" और फिर वह ऐतिहासिक वादा—अगले दस वर्षों में भारत को 'गुलामी की मानसिकता' से पूरी तरह आजाद करना। यह रोडमैप कोई कागजी योजना नहीं, बल्कि एक जीवंत क्रांति है, जो हर भारतीय को राम की तरह संघर्षशील बनाएगी, अपनी जड़ों से जुड़ाएगी। अयोध्या, जहां राम मंदिर अब खड़ा है, वहां 45 करोड़ से ज्यादा लोग दर्शन कर चुके हैं—यह संख्या नहीं, बल्कि एक आंदोलन है, जो बताता है कि राम सिर्फ मंदिर में नहीं, हर दिल में बसते हैं।

गुलामी की मानसिकता—यह क्या है? वह अदृश्य जहर जो 1835 में लॉर्ड मैकॉले ने बोया, शिक्षा के नाम पर हमें अपनी संस्कृति से दूर करना, हमें पश्चिमी सोच का गुलाम बनाना। आज भी वह जहर हमारे विचारों में बहता है: अपनी भाषा को कमतर समझना, पश्चिमी संस्कृति को श्रेष्ठ मानना, राम को सिर्फ कहानी मानना। मोदी जी ने इसे सीधे चुनौती दी—"हमारी आजादी अधूरी है, क्योंकि मन अभी गुलाम है।" दस वर्षों का यह रोडमैप इसी जहर को निकालने का है।

पहला पड़ाव: सांस्कृतिक जागरण। राष्ट्रीय शिक्षा नीति को मैकॉले की छाया से मुक्त करना, स्कूलों में रामायण को जीवंत बनाना। जहां बच्चे न सिर्फ पढ़ें, बल्कि राम के गुणों—धैर्य, दया, नेतृत्व—को जीएं। जैसे राम ने वनवास में भी संकल्प नहीं छोड़ा, वैसे ही हर बच्चा अपनी जड़ों से मजबूत बने। यह होगा राष्ट्र का नया निर्माण, जहां भारत अपनी विरासत पर गर्व करे, न कि किसी विदेशी सोच पर। मोदी जी ने कहा, "राम व्यक्ति नहीं, मूल्य हैं—जो हमें दिशा देते हैं।" और यह मूल्य अब भारत की अर्थव्यवस्था में भी दिखेंगे: आज हम दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हैं, जल्द तीसरी बनेंगे। लेकिन असली जीत तब होगी जब हम आर्थिक स्वावलंबन को राम के स्वदेशी से जोड़ें।

यह रोडमैप सरल है, लेकिन अप्रतिम—क्योंकि यह राम राज्य के सपने पर टिका है। राम राज्य में क्या था? न्याय की धारा हर घर तक, पर्यावरण का सम्मान जहां जटायु और गिलहरी भी योगदान दें, समाज जहां कोई भेदभाव न हो। मोदी जी ने अयोध्या को इसी का प्रतीक बताया—"यहां का सामूहिक प्रयास विकसित भारत 2047 का रोडमैप है।" दस वर्षों में, हमें 'मेक इन इंडिया' को राम की उद्यमिता से सशक्त करना है। युवाओं को स्टार्टअप्स में राम सेतु जैसा पुल बनाना सिखाना—छोटे प्रयासों से बड़ा लक्ष्य।

अयोध्या, अब हजारों तीर्थों का मॉडल बनेगी। पर्यटन से अर्थव्यवस्था बूम करेगी, लेकिन साथ में सांस्कृतिक दूतावास भी। युवाओं की भूमिका यहां सबसे दमदार है। आज की पीढ़ी, जो सोशल मीडिया पर खोई है, उसे राम की कहानी से जोड़ना। मोदी जी का आह्वान—"युवा उठो, राम के धनुष को उठाओ।" दस वर्षों का दूसरा चरण: युवा सशक्तिकरण। सोशल मीडिया पर राम कथा वायरल करना, एनजीओ से ग्रामीण भारत में राम मेलों का आयोजन। जैसे राम ने लक्ष्मण और हनुमान के साथ टीम बनाई, वैसे ही युवा एकजुट हों। लेकिन यह सिर्फ शब्द नहीं—व्यावहारिक कदम, जैसे डिजिटल रामायण ऐप्स, जहां युवा राम के संघर्ष से प्रेरणा लें और अपनी जिंदगी में लागू करें।

अनुपम बात यह है कि यह रोडमैप समावेशी है। राम राज्य में कोई भेदभाव नहीं—दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, सबका साथ। मोदी जी ने कहा, "राम के कण-कण में भारत, भारत के कण-कण में राम।" दस वर्षों का तीसरा चरण: सामाजिक सद्भाव। जाति की दीवारें राम नाम से तोड़ना, त्योहारों को साझा बनाना। कल्पना कीजिए, एक भारत जहां त्योहार राम की तरह साझा हों, जहां गिलहरी जैसा छोटा योगदान भी बड़ा बने।

लेकिन चुनौतियां हैं—विपक्ष की आलोचना, सेकुलरिज्म के नाम पर सांस्कृतिक अस्मिता को दबाना। मोदी जी का जवाब साफ—"संकल्प की सिद्धि में सबका प्रयास।" यह दस वर्ष 2047 तक विकसित भारत की नींव रखेंगे, जब आजादी के सौ साल पूरे होंगे। तब भारत न सिर्फ आर्थिक महाशक्ति बनेगा, बल्कि विश्व गुरु भी—राम के आदर्शों से। अयोध्या का यह ध्वजारोहण 500 साल पुराने संकल्प की पूर्ति है, लेकिन नई शुरुआत भी।  सदियों पुराने घाव भर रहे हैं, क्योंकि राम मंदिर अब सिर्फ ईंट-पत्थर नहीं, बल्कि एकता का प्रतीक है।

सरल शब्दों में कहें तो यह वादा हर भारतीय का है। मोदी जी की वाणी जैसे राम की वाणी—शांत, लेकिन अटूट। "हमारी विरासत पर गर्व करो, गुलामी की मानसिकता से मुक्त हो जाओ।" युवाओं, सुनो—यह तुम्हारा समय है। राम के जैसे संघर्ष करो, लक्ष्य पर नजर रखो। दस वर्षों में, हम मैकॉले की किताबों को रामायण से बदल देंगे। पर्यावरण संरक्षण से लेकर सामाजिक न्याय तक, सब राम राज्य से प्रेरित। अयोध्या की सरयू आज गवाह है—राम लौट आए हैं, और उनके साथ एक नया भारत जाग रहा है। यह यात्रा शुरू हो चुकी, अब रुकना नहीं। राम के नाम पर, भारत के नाम पर—जय सिया राम!

 - प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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