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कहानी : पतझड़ - – लतिका जाधव, पुणे


 

 कहानी : 

पतझड़

         – लतिका जाधव, पुणे


  अब तेज धूप ढलने लगी थी।   हवा की हल्की सी लहर से सरसराहट  करती पतझड़ की पत्तियों को डॉक्टर हर्ष देख रहे थे। उनकी कालोनी के बीच बनी एक साफ़  सुथरी बगियाँ के बीच वह घूम रहे थे। विशाल फैले गुलमोहर के नीचे वहाँ लंबे सिमेंट के बने बेंच रखें थे। एक बेंच पर जो गुलमोहर के फूल गिरे थे, उनको हटाकर वह बैठ गए। एक लंबी सांस लेकर उन्होंने उपर देखा। गुलमोहर अपने लाल रंग में खिल उठा था। फिर यकायक उन्होंने अपने पैरों के जूते उतार दिए। सिर पर जो कैप थी उसको भी उतारकर बेंच पर रख दिया।  फिर उपर  गुलमोहर की ओर टकटकी लगाए बेंच पर सो गए।  एक सकून भरी आज़ादी जैसा महसूस करने लगे। फिर उन्होंने आंखों को मूंद कर अपना चेहरा रुमाल से ढ़क लिया। आज़ादी की लहरों में खोने लगे। 

लेकिन यह आनंद भी ज्यादा समय नहीं टिका। उनको किसी के कदमों की आहट सुनाई देने लगी। फिर भी वह वैसे ही पड़े रहे। अब कदम उनके पास आकर रुके और बेझिझक किसीने उनके चेहरे का रुमाल हटाया।

“डॉक्टर अंकल, क्या हो गया?” अंकुश घबराकर बोला।

डॉक्टर साहब  का आज़ादी का ख़याल एकदम चकनाचूर हो गया। “कुछ नहीं।बस अच्छा लगा तो यहां सो गया”

“अंकल घर में सोना चाहिए ना?” अंकुश अपनी स्कूल बैग सामने के बेंच पर पटकते हुए बोला।

“ अच्छा चल! तू इधर कैसे आया” डॉक्टर साहब अब सचमुच परेशान हो गए थे।

“वह मैं घर की चाबी खो चुका हूँ। अब मेरे पेरेंट्स जब तक घर वापस लौट कर नहीं आएंगे मैं कहा जाऊं तो मैं यहां आ गया” अंकुश के मां – पिता दोनों ही नौकरी करते थे। आते आते उनको शाम हो जाएगी।

सब सुनकर डॉक्टर साहब ने उसको कहा, “अब तू भी सुस्ता ले। मुझे भी पड़ा रहने दे। बहुत दिनों से मन कर था फुर्सत मिलें तो आज़ादी से यहां हवा में पड़ा रहूँ”

“हां अंकल आयडिया बुरा नहीं है। मुझे भी अच्छा लगा”

अंकुश ने अपना नेकटाई,बेल्ट, जूते, साक्स सबको उतार दिया। पांच किलो का स्कूल बैग सिरहाने रख वह भी उपर पेड़ की तरफ ध्यान से देखने लगा।

“अंकल, पेड़ और उपर नीला आकाश कितना सुंदर लग रहा है”

डॉक्टर साहब सोचने लगे। प्रकृति के पास जाने के बाद मनुष्य कितना बदल जाता है। लेकिन उफ! सब बदलते नहीं। हम भी स्वार्थी दुनिया में रहकर वैसे ही हो रहे हैं। 

“अंकल आप को यहाँ सोते हुए डर नहीं लगा” अंकुश जिज्ञासु हो गया था।

“किस बात का डर? लोग क्या कहेंगे या कुत्तों का डर”

“लोग क्या कहेंगे का डर अंकल” अंकुश झिझकते हुए बोला।


डॉ. हर्ष मुस्कुराते हुए बोले, "लोग क्या कहेंगे? मैं डॉक्टर हूँ। प्रकृति से जुड़ा हूँ। मेरा बचपन गांव में गया। मैंने सरकारी स्कूलों में पढ़ाई की। फिर भी मैं डॉक्टर बन गया। मैंने तो मनुष्य देह की चिकित्सा के साथ मन की चिकित्सा का भी प्रयास किया है। प्रकृति से बड़ा कोई नहीं।लेकिन हमें प्रकृति से छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए”


अंकुश  मजे से बातें सुन रहा था। फिर बोल उठा, “आज मुझे आपकी सच्ची पहचान हुई है। काश यह बात सब समझ पाते” अंकुश ने अफ़सोस भरे अंदाज में कहा।

डॉक्टर खुलकर बोलने लगें,“हम जहां रहते हैं,उस समाज का हिस्सा बन जाते हैं।अनजाने में उनका अनुकरण भी करते हैं। जैसे कि अब आपका स्कूल, युनिफोर्म सब इस शहर, सामाजिक प्रतिष्ठा से जुड़ा है”

अंकुश भी खुलकर बात करने लगा, “सुबह- सुबह इस तैयारी में बहुत समय जाता है। पर अंकल क्या करें?”


डॉक्टर हर्ष अंकुश की तरफ़ सहानुभूति से देखने लगे। सचमुच हमनें इस बदलाव को कैसे झेला? सोचने लगे। “अंकुश, हम जिस गांव में पढें वहां एक ही सरकारी स्कूल था। हमें उसके सिवाय कोई पर्याय ही नहीं था। स्कूल का युनिफोर्म खाकी पैंट सफेद शर्ट था। उस समय सभी सुती कपड़ें पहनते थे। हमारे लिए अलग से कोई कोचिंग क्लास नहीं थी। जिनको पढ़ना था वे मेहनत से ही आगे बढ़ जाते थे.”


अंकुश आश्चर्य से बोल उठा, “लेकिन आप डॉक्टर बनने के लिए किसी के तो कोचिंग सेंटर में गए ही होंगे?”


डॉक्टर हर्ष ने उसको समझाया, “नहीं उस वक्त यह नहीं था। आपके पर्सेंटेज पर मेरीट लिस्ट बनती थी। मुझे आयुर्वेद में दिलचस्पी थी।मैं आयुर्वेद संस्थान में गया।वहां से डॉक्टर बना”

अंकुश सब सुनकर गंभीर स्वर से बोला, “ हमारा समय तो बहुत ही पेचीदा है”


डॉक्टर हर्ष उसको समझाते हुए बोले, “मैं अपने घर में बच्चों से भी यही सुनता हूँ। बस अब अपने आप पर विश्वास कीजिए। हर क्षेत्र में कुछ न कुछ करने जैसा है। लेकिन मेहनत के सिवा कुछ हासिल नहीं होता है।इस बात को कभी भी भूलना नहीं।”


तभी अंकुश की मां उसको पुकारती हुई वहां आ गई। उन दोनों का समय  बातचीत में गुजर रहा था।

 मां को देखकर अंकुश अपनी सारी चीजों को समेटने लगा। डॉक्टर हर्ष को देखकर अंकुश की मां भी खुश हो गई, “चलो अच्छा हुआ, आपके साथ बातें कर रहा था। मैं बहुत परेशान हो गई थी। कहाँ जाएगा? और क्या करेगा?”

डॉक्टर हर्ष अब बेंच पर उठकर बैठ गए थे। उन्होंने अंकुश की मां को कहा, “अंकुश बहुत समझदार हैं। मुझे भी उसके साथ बातें करते हुए अच्छा लगा।अपना बचपन याद आ गया”


बगियाँ में अब चहलपहल बढ़ने लगी थी। अंकुश मां के साथ जाने के लिए तैयार हो गया। 


डॉक्टर साहब भी उनके साथ घर लौटने के लिए यह सोचते हुए निकल पड़े कि, मनुष्य प्रकृति से साथ जितना खुश हैं शायद और कहीं भी नहीं रह सकता। सचमुच अंत में जिंदगी का अपना बीता हुआ हर लम्हा, हर पल पतझड़ के पत्तों जैसा लगता है। हम जहां भी नये से रहने जाते हैं, वहां की शैली का अनुकरण कर लेते हैं। वह कैसी है उस समय सोचने के लिए समय तक नहीं रहता है। अब जिंदगी के पतझड़ मे सोचने लगा हूँ। मैंने भी अपने बच्चों को इन्हीं स्कूलों में भेजा।रोजमर्रा की दौड़ में हम सब बेबस से जी रहे थे।वैसे मैं अकेला नहीं। मेरे जैसे बहुत है। मैं उम्र के पचास सालों बाद अपने आप को नये से ढूंढ रहा हूँ। अब पतझड़ हो रही हैं। तब ऐसा लगता है कि, यह सब पुनः पहले जैसा होना चाहिए। प्रकृति से जुड़ना चाहिए। इसलिए हर गांव को स्वयंभू बनाना होगा। वर्ना शहरों में रोजगार के लिए बढ़ती भीड़ एक दिन संहार का रूप बन जाएंगी।

---------------समाप्त---------------

द्वारा – लतिका जाधव, पुणे (महाराष्ट्र)

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

2 Comments

  1. बहुत सुंदर कहानी मैडम, बधाई।

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  2. संपादक,
    श्री. देवेंद्र सोनी जी,
    मेरी कथा प्रकाशित करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद!
    🙏🌿

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