काव्य :
कलियुग
कलियुग चरम पर आ रहा है ,
देखो कैसा कहर बरपा रहा है ।
निस्वार्थ अब रहा न कुछ भी ,
स्वार्थ ही अपना पग जमा रहा है ।
पिता घिसता एड़ीया जीवन भर,
बुढ़ापे में दो रोटी दे, बेटा अहसान जता रहा।
जो बच पायेगा बच ले रे भैया ,
कलियुग सबको खा रहा ।
जंगली जानवर अब बंद पिंजरों में,
इंसान जंगली बनता जा रहा ।
पहले मांसाहारी जानवर होते थे ,
अब इंसान ही इंसान खा रहा ।
मिठाई डिब्बे में सजे सजाए ,
खुशियों में बाटे जाते थे ।
अब आदमी कुकर में पककर ,
मोहल्ले में बट जाते हैं ।
जानवरों से नहीं इंसान से खतरा बढ़ता जा रहा ,
जो बच पायेगा बच ले रे भैया
कलियुग सबको खा रहा ।
अग्नि के सामने साथ फेरे अब कम ही होते हैं ,
कोट में रिश्ते कागज में छपे रह जाते हैं ।
कितना ही यह कागज का रिश्ता ,
दूर तक चल पाएगा ।
दुपहिया गाड़ी एक दिन ,
एक ही पहिए में बदल जाएगा ।
जो कभी सात जन्मों का हुआ करता था,
वो रिश्ता कागज की कस्ती पे सवार हो रहा।
जो बच पायेगा बच ले रे भैया
कलियुग सबको खा रहा।
कलियुग का आगमन क्या हुआ ,
काल सब के सर नाच मंडरा रहा ।
कोई सेल्फी के चक्कर में ,
तो कोई दुर्व्यसन से मरता जा रहा।
अवैध संबंधों का चक्रव्यूह भी,
आज घेरे हुए है मन मस्तिष्क को ।
जलती थी नारी एक कलयुग ऐसा भी था,
अब के बरस पुरुष नीले ड्रम जा रहा ।
जो बच पायेगा बच ले रे भैया
कलियुग सबको खा रहा ।
रिश्वत की जंजीरें समाज को जकड़े हुएहैं ,
गरीबों की उम्मीदे सारी राह में पड़े हैं ।
सच्चाई अब गूंगी बैठी मौन है साधी ,
भ्रष्टाचार ऊंचे दीवार में बैठे ऊंचे स्वर है उठाती ।
अपने ही हक के लिए आज ,
रिश्वत के दलदल में डुबाया या
तो कभी डूबकर मरना पड़ रहा है ।
जो बच पायेगा बच ले रे भैया
कलियुग सबको खा रहा है ।
फैशन तो पूछो मत कैसे चरम में पहुंची है,
तन ढंके परिधान कहा है अब दिखते।
कट रहे यहां वहां से बनी ही ऐसी कैंची है ,
सुंदर चेहरे को बंदर बना दे ऐसा भी ट्रेंड है ।
टेडे मेडे मुंह बनाकर कहते ये तो पाउट है ,
घिबली आर्ट आज आदमी को कार्टून बना रहा।
बचना है तो बच ले रे भैया ,
कलियुग सबको खा रहा ।
कलियुग राजा अब तो दया खा ले ,
हो रहे अपराध बहुत अब तो रोक लगा ले।
कितनी निर्भया और तार तार होंगी,
हाय जरा तो अब हैवानियत बचा ले।
शर्म हया का नामोनिशान मिटता जा रहा,
बचना है तो बच ले रे भैया
कलियुग सबको खा रहा ।
- श्रीमती अंजना दिलीप दास
बसना ,महासमुंद( छत्तीसगढ़ )
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