काव्य :
कर रहा है
बिछड़ने का इरादा कर रहा है
वह मुझको फिर से आधा कर रहा है।
सुनी आने की फिर उसकी सदा है
मेरे दिल को कुशादा कर रहा है।
कहीं भी जुल्म के आंसू न होंगे
भरी बस्ती से वादा कर रहा है।
कहां सब ठीक है हरदम यहां पर
जरा थोड़ा या ज्यादा कर रहा है ।
नहीं पहचानना मुमकिन लगा है
वह तन पर फिर लबादा कर रहा है।
- आर एस माथुर , इंदौर
कुशादा/स्वस्थ
लबादा/cloak
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काव्य
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