लघु कथा :
भाषा नहीं, पहचान है
कक्षा में हिंदी दिवस की तैयारी चल रही थी। अध्यापिका ने बच्चों से पूछा,
“बताओ, तुम्हें हिंदी क्यों पसंद है?”
एक बच्चे ने कहा, “मैम, हिंदी हमारी मातृभाषा है।”
दूसरे ने कहा, “इसमें बहुत सुंदर कविताएँ हैं।”
पीछे बैठा आनंद चुप था।
अध्यापिका ने पूछा, “तुम कुछ नहीं कहोगे?”
आनंद धीरे से बोला,
“मैम, पापा कहते हैं कि हिंदी से क्या मिलेगा? अच्छी नौकरी चाहिए तो अंग्रेज़ी बोलो।”
कक्षा कुछ क्षणों के लिए शांत हो गई।
अध्यापिका ने मुस्कुराकर कहा,
“अंग्रेज़ी सीखना गलत नहीं है, बेटा। हर भाषा ज्ञान का एक दरवाज़ा है। लेकिन अपनी भाषा को भूलकर आगे बढ़ना, अपनी जड़ों को भूलने जैसा है।”
उन्होंने बोर्ड पर लिखा—
“भाषा केवल शब्दों का माध्यम नहीं,
यह हमारी स्मृतियों, संस्कारों और पहचान का घर है।”
कुछ दिनों बाद आनंद के पिता विद्यालय आए। उन्होंने अध्यापिका से कहा,
“मैडम, कल मेरे बेटे ने दादी को हिंदी में एक पत्र लिखा। दादी पढ़ते-पढ़ते रोने लगीं।”
अध्यापिका ने पूछा, “क्यों?”
वे कुछ पल चुप रहे, फिर बोले—
“क्योंकि वर्षों बाद किसी ने उनसे उनकी अपनी भाषा में दिल की बात कही थी।”
अध्यापिका ने बोर्ड की ओर देखा।
उन्हें लगा—
हिंदी को बचाने के लिए बड़े-बड़े भाषणों की जरूरत नहीं,
जरूरत बस इतनी है कि हम अपने मन की बात अपनी भाषा में कहना न छोड़ें।
क्योंकि—
भाषा केवल बोली नहीं जाती,
भाषा में एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी से जुड़ती है।भाषा सिर्फ भाषा नहीं, हमारी पहचान है।
- डॉ विजयता दुबे , कोलकाता
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कथा कहानी
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