नर्मदा परिक्रमा ने सिखाया अहंकार छोड़कर सेवा और निर्भयता से जीना
मंदसौर में पूर्व कलेक्टर एवं पूर्व प्रमुख सचिव श्री ओमप्रकाश श्रीवास्तव ने सुनाए नर्मदा यात्रा के संस्मरण और अनुभूतियां
अष्टमूर्ति ग्रुप ने किया श्री नर्मदा यात्रा संस्मरण प्रसंग का सारस्वत आयोजन
मंदसौर से डॉ घनश्याम बटवाल की रिपोर्ट
मंदसौर। नर्मदा की पद परिक्रमा केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि स्वयं को जानने, अहंकार से मुक्त होने और सेवा, त्याग, वैराग्य तथा निर्भयता का बोध कराने वाली साधना है। यात्रा के दौरान व्यक्ति को यह अनुभव होता है कि जीवन के लिए बहुत अधिक साधनों की आवश्यकता नहीं है। नर्मदा मैया के किनारे साधु-संतों और सामान्य लोगों की आत्मीय भाव की सेवा यह सिखाती है कि जिसके पास देने के लिए बहुत कम है, वह भी श्रद्धा और प्रेम से बहुत कुछ दे सकता है। यह बात मंदसौर के पूर्व कलेक्टर एवं पूर्व प्रमुख सचिव मध्यप्रदेश श्री ओमप्रकाश श्रीवास्तव ने नर्मदा पद परिक्रमा के संस्मरण और अनुभूतियां सुनाते हुए कही।
103 दिनों की नर्मदा पद - परिक्रमा पूरी करने के बाद मंदसौर पहुंचे पूर्व कलेक्टर ओमप्रकाश श्रीवास्तव एवं उनकी पत्नी श्रीमती भारती श्रीवास्तव के सम्मान में नपा सभागार, गांधी चौराहा पर अष्टमूर्ति ग्रुप द्वारा श्री नर्मदा यात्रा संस्मरण प्रसंग का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में राज्यसभा सांसद एवं भाजपा किसान मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री बंशीलाल गुर्जर विशेष अतिथि थे ।
पूर्व वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी और अध्यात्म अध्येता श्री ओमप्रकाश श्रीवास्तव ने कहा कि प्रशासनिक सेवा काल के दौरान उन्हें जिस तरह की कार्य संतुष्टि और स्नेह अपनत्व मंदसौर जिले में मिला, वह पूरे सेवा काल में कहीं और नहीं मिला। नर्मदा पद परिक्रमा के अनुभव साझा करते हुए उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति के भीतर शांति, वैराग्य, प्रेम और करुणा उत्पन्न होने लगे तो समझना चाहिए कि साधना सही दिशा में आगे बढ़ रही है। भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी देन यह है कि वह दिखाई देने वाले संसार के पीछे मौजूद उस सत्य को जानने की प्रेरणा देती है, जिसे हम ईश्वर कहते हैं। जिस तरह विज्ञान के नियमों को समझकर हम संसार को बदलते हैं, उसी तरह अध्यात्म के नियमों को अपने भीतर उतारने पर ईश्वर की अनुभूति की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।
उन्होंने कहा कि नर्मदा परिक्रमा में कई ऐसे अनुभव हुए, जिन्होंने जीवन को देखने का नजरिया ही बदल दिया। घर में रहते हुए व्यक्ति निश्चिंतता का जीवन जीता है, लेकिन यात्रा में अगले पड़ाव पर क्या मिलेगा, इसकी कोई निश्चितता नहीं होती। जब परिक्रमा शुरू की तो पीठ पर काफी सामान था, लेकिन दो दिन में समझ आ गया कि इतना सामान लेकर चलना संभव नहीं है। सामान कम किया तो अनुभव हुआ कि कम साधनों में भी जीवन चल सकता है और कई बार बेहतर ढंग से चल सकता है।
पूर्व वरिष्ठ अधिकारी श्रीवास्तव ने कहा कि नर्मदा यात्रा व्यक्ति के अहंकार की परीक्षा भी लेती है। जीवनभर पद पर रहते हुए जिस तरह लोग सम्मान देते हैं, यात्रा में परिस्थितियां बिल्कुल अलग होती हैं।
उन्होंने संस्मरण सुनाते हुए कहा कि एक दिन किसी ने सहज भाव से कहा कि बाबाजी चाय पी लो और कहीं किसी ने चाय के लिए दस रुपए दे दिए। ऐसी छोटी-छोटी घटनाएं व्यक्ति को यह समझाती हैं कि वह वास्तव में क्या है और उसके पद या बाहरी पहचान का क्या महत्व है।
उन्होंने कहा कि परिक्रमा के दौरान कभी बकरियों और मुर्गियों के साथ भी सोना पड़ा तो कभी जंगल में ऐसे आश्रम में पहुंचे, जहां ताला लगा था। आश्रम के महंत से फोन पर संपर्क हुआ तो उन्होंने बताया कि वे जबलपुर मेडिकल कॉलेज में भर्ती हैं, लेकिन आश्रम में भोजन सामग्री रखी है, उसे बनाकर भोजन कर लें और वहीं आराम करें। उन्होंने कहा कि परिक्रमा मार्ग में ऐसे अनेक लोग मिले, जिनके पास स्वयं के लिए बहुत कुछ नहीं था, फिर भी वे साधकों की आत्मीयता से सेवा करते थे। नर्मदा मैया सेवा का भाव सिखाती हैं।
उन्होंने कहा कि यात्रा के दौरान भय की परिस्थितियां भी आईं। जंगल और नदी के रास्ते में जंगली तथा जलीय जीवों से सामना हुआ, लेकिन निर्भय होकर आगे बढ़ने से धैर्य और आत्मविश्वास मजबूत होता है। परिक्रमा इंद्रिय नियंत्रण और धैर्य का अभ्यास भी कराती है। उन्होंने बताया कि यात्रा के दौरान कई तरह की परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। एक स्थान पर बच्चा चोरी की अफवाह के कारण बच्चे उन्हें देखकर भागने लगे। ऐसी स्थिति में सावधानी से वहां से निकलना पड़ा। उनके अनुसार यात्रा ज्ञान, योग और भक्ति तीनों की अनुभूति कराती है तथा वेदांत के ज्ञान से भी परिचित कराती है।
श्रीवास्तव ने कहा कि मनुष्य कर्म करने के लिए इस संसार में आया है और कर्म के फल की अपेक्षा करता है। यात्रा व्यक्ति को कर्म और उसके परिणाम के प्रति अलग दृष्टि देती है। उन्होंने कहा कि नर्मदा मैया से मांगना ही है तो उनसे शिव के दर्शन कराने की प्रार्थना करनी चाहिए। जीवन में अवसर मिले तो युवावस्था में ही ऐसी यात्राएं करनी चाहिए, क्योंकि यात्रा व्यक्ति के भीतर बड़ा परिवर्तन ला सकती है।
उन्होंने बताया कि नर्मदा परिक्रमा के बाद नर्मदा किनारे आश्रम देह - विदेह बनाया गया है और एक एनजीओ के माध्यम से प्रदेश के 16 जिलों में करीब एक हजार बच्चों को शिक्षा दी जा रही है। उन्होंने इसे नर्मदा मैया का प्रसाद बताते हुए कहा कि यात्रा से लौटकर सेवा का भाव जीवन में बना रहना ही यात्रा की वास्तविक सार्थकता है।
इसके पूर्व श्रीमती भारती श्रीवास्तव ने नर्मदा पद परिक्रमा की आध्यात्मिक और पौराणिक परंपराओं का उल्लेख करते हुए कहा कि नर्मदा को अमर नदी माना गया है। उन्होंने नर्मदा के उद्गम, उसके विभिन्न स्वरूपों और परिक्रमा की परंपरा के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि अमरकंटक से छोटी धारा के रूप में निकलकर नर्मदा आगे बढ़ती है और कई स्थानों पर अलग-अलग स्वरूपों में दिखाई देती है।
उन्होंने बताया कि परिक्रमा सामान्यतः पैदल की जाती है। वर्तमान समय में लोग साइकिल, कार, बस और अन्य साधनों से भी यात्रा करते हैं, लेकिन पैदल परिक्रमा में साधक लंबे समय तक मां नर्मदा के साथ रहता है और यही तप तथा साधना का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। परंपरागत रूप से परिक्रमा की अवधि तीन वर्ष, तीन माह और 13 दिन बताई जाती है।
श्रीमती भारती श्रीवास्तव ने कहा कि परिक्रमा के दौरान साधक नर्मदा का जल अपने साथ लेकर चलता है और प्रतिदिन उसका पूजन-अर्चन करता है। समुद्र में पहुंचकर जल अर्पित करने और पात्र में नया जल भरने की परंपरा है। इसके बाद अमरकंटक में भी जल अर्पित कर पुनः जल लेकर आगे बढ़ा जाता है और परिक्रमा पूर्ण होने पर ओंकारेश्वर में शिव का अभिषेक तथा कन्या पूजन किया जाता है। परिक्रमा पद यात्रा सूर्योदय से सूर्यास्त तक चलती है।
उन्होंने कहा कि यात्रा की शुरुआत ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र से हुई थी, लेकिन कब यह ‘नर्मदे हर’ के जयघोष में बदल गया, इसका पता ही नहीं चला। नर्मदा किनारे की यात्रा में त्याग, वैराग्य, भक्ति और सेवा के भाव का निरंतर अनुभव होता है।
कार्यक्रम में राज्यसभा सांसद एवं भाजपा किसान मोर्चा राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री बंशीलाल गुर्जर ने कहा कि नर्मदा परिक्रमा के अनुभव सुनना स्वयं में प्रेरणादायी है। उन्होंने कहा कि उन्हें नर्मदा मैया की कृपा प्राप्त है क्योकि उनकी माता का नाम ही नर्मदा है और वे नर्मदा पुत्र हैं।
आपने कहा कि अहंकार से मुक्त होना कठिन है, लेकिन जब व्यक्ति धरातल पर रहकर अपने भीतर झांकना शुरू करता है और बाहरी आवरण छोड़ता है तो वह ईश्वर के निकट पहुंचने लगता है। उन्होंने कहा कि श्री ओमप्रकाश श्रीवास्तव और श्रीमती भारती श्रीवास्तव की संयुक्त नर्मदा परिक्रमा यात्रा के अनुभवों से सभी को प्रेरणा मिलेगी और नर्मदा मैया की कृपा सभी पर बनी रहेगी।
श्री गुर्जर ने अपने सार्वजनिक जीवन का उल्लेख करते हुए कहा कि किसानों की समस्याओं और उनके दुख के कारणों तथा समाधान पर विचार करते-करते वे किसान मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी तक पहुंचे। उनका संकल्प है कि किसान को सम्मान के साथ जीवन मिले और इसके लिए लगातार प्रयास किए जाएं। उन्होंने कहा कि इस संकल्प की पूर्ति में मंदसौर का भी महत्वपूर्ण योगदान है और मंदसौर से मिली प्रेरणा के आधार पर बेहतर कार्य करने का प्रयास जारी रहेगा। आपने अष्टमूर्ति ग्रुप को सार्थक आयोजन के बधाई देते हुए सराहना की ।
स्वागत उद्बोधन एवं आयोजन की भूमिका वरिष्ठ पत्रकार डॉ. घनश्याम बटवाल ने रखी। संचालन वरिष्ठ पत्रकार ब्रजेश जोशी ने किया आभार डॉ. देवेंद्र पुराणिक ने माना। आरंभ में धर्म सेवी बंशीलाल टांक ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की।
अतिथियों का स्वागत एवं सम्मान शाल ओढ़ा कर पुष्प गुच्छ द्वारा अष्टमूर्ति ग्रुप के सर्व श्री डॉ. देवेंद्र पुराणिक डॉ. घनश्याम बटवाल, ब्रजेश जोशी,अजय कुमार सिखवाल एडवोकेट, प्रद्युम्न शर्मा पार्टनर,महेश शर्मा पप्पू, अजय तिवारी,राजीव शर्मा ने किया। इस अवसर पर पूर्व एक्साइज़ एडिशनल कमिश्नर श्री मुकेश नेमा एवं श्रीमती नेमा विशेष रूप से उपस्थित रहे। अष्टमूर्ति ग्रुप द्वारा नेमा दम्पति का भी स्वागत सम्मान किया ।
इस मौके पर स्वतंत्रता सेनानी एवं वरिष्ठ पत्रकार स्व. श्री केशव प्रकाश विद्यार्थी जीवन केंद्रित संग्रह "अनासक्त कर्मयोगी" और "सरल गीता" पुस्तक श्री विक्रम विद्यार्थी ने और प्रार्थना पुस्तिका "आराधना" डॉ घनश्याम बटवाल ने श्रीवास्तव दंपति और नेमा दम्पति को सम्मान स्वरूप भेंट की ।
संस्मरण प्रसंग समारोह में गुरुचरण बग्गा, पूर्व न्यायाधीश आर एस चुण्डावत नपाध्यक्ष श्रीमती रमादेवी गुर्जर डॉ. विजय शंकर मिश्र डॉ गोविन्द छापरवाल, डॉ. उर्मिला सिंह तोमर भारती पाटीदार, डॉ. रविन्द्र सोहोनी राजाराम तंवर सत्येन्द्र सिंह सोम
पं.देवेश्वर जोशी पंडित दशरथ भाई पं.गोपाल पंचारिया ,पूर्व अपर कलेक्टर,एन एस राजावत डॉ किशोर शर्मा इतिहासकार कैलाश चन्द्र पाण्डेय, नरेन्द्र त्रिवेदी नंदकिशोर राठौर गोपाल बैरागी, गोपाल कृष्ण पाटिल प्रो जे एस दुबे,अरुण शर्मा मदनलाल राठौर, कांतिलाल राठौर जय प्रकाश बसेर डी आर लिलोरिया बालाराम गुप्ता8 विक्रम विद्यार्थी सुनील व्यास दिलीप जोशी राजेश पाठक चेतन जोशी हरि शंकर शर्मा महेन्द्र प्रताप सिंह परिहार गिरिराज दास सक्सेना कन्हैया लाल सोनगरा राव विजय सिंह प्रदीप भाटी ओमप्रकाश दवे अजीजुल्लाह ख़ालिद गायत्री प्रसाद शर्मा लोकेश पालीवाल ललित पटेल, राजपाल सिंह परिहार, अजय कुमार बड़ोलिया दिलीप कुमार गौड़ चन्द्र शेखर निगम राघवेंद्र गौड़ शैलेन्द्र माथुर संजय नीमा डॉ आरती जैन अशोक शर्मा महेश चंद्र सोमानी रविन्द्र दवे विक्रम भटनागर, अनिल संगवानी सुरेश भावसार शम्भु सेन राठौड़ मुकेश आर्य आशीष गौड़,पं.ओमप्रकाश शर्मा शत्रुंजय सोनी खुमान सिंह चुण्डावत कृष्ण कुमार जोशी सुदीप दास राजकुमार गुप्ता एडवोकेट आदि अनेक गणमान्यजन उपस्थित थे।
श्री पशुपतिनाथ महादेव दर्शन पूजन अभिषेक किया
अपने प्रवास पर मंदसौर कलेक्टर एवं पशुपतिनाथ मंदिर प्रबंध समिति अध्यक्ष रहे श्री ओमप्रकाश श्रीवास्तव और मंदसौर में पूर्व जिला आबकारी अधिकारी रहे श्री मुकेश नेमा दम्पति ने भगवान पशुपतिनाथ महादेव मंदिर में दर्शन पूजन अर्चना आरती और अभिषेक किया मुख्य पुजारी पण्डित कैलाश चन्द्र भट्ट पण्डित राकेश भट्ट एवं पण्डित सुरेन्द्र आचार्य ने विधिपूर्वक पूजन अर्चना कराई ।
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