ad

व्यंग्य : एम्बुलेंस- एक एहसास - कर्नल डॉ गिरिजेश सक्सेना भोपाल


व्यंग्य : 

एम्बुलेंस- एक एहसास

 सड़क पर सारी चिल्ल पों चीखते कान फोड़ते हार्न्स के बीच एक कान भेदती हुयी सी आवाज़ होती है सायरन या हूटर की जो वास्तव में कई प्रकार की ध्वनियों के होते है| असलियत तो पास आने पर पता चलती है की ये हूटर बाबा है|  
एक सायरन साहेब होते है शहंशाही इस्तकबाल वाले, जिनकी शान में एक लाल झंडा बंधे तेज़ गति से भागती गाड़ी, भोंपू (लाऊड स्पीकर) पर चीखते, सड़क ख़ाली करने का ऐलान करते,जिसे पुलसिया भाषा में रोड सेनेटाईजेशन कहते है| उसके 20-40 मीटर पीछे कुछ कमतर गति की सायरन बजाती गाड़ी, जिसमें बाईं तरफ एक डंडे पर लाल झंडा पकड़े एक पुलसिया यह इंगित करता की उस तरफ मंत्री-मुख्यमंत्री  या अन्य कोई वी वी आई पी( वेरी इर्रेस्पोंसिब्ल परसन) विराजमान है| इस गाडी के पीछे सात से दस कारों का काफिला ( मोटरकेड) होता है| आमतौर पर यह सारा जलसा- जुलूस मुख्यमत्री, केन्द्रीय मंत्री, राज्यपाल या ऐसे ही किसी कद्दावर का होता है| यहाँ सायरन के आलावा सड़क पर कोई परिंदा पर न मार जाए, सड़क के दोनो तरफ पुलिसिये लाइनप होते,अगल बगल की सड़कों-गलियों से कोई गुस्ताख राह का रोड़ा न बन जाए पुलसिया बेरिकेड्स लगाए मुस्तैद खड़े होते है| 
दूसरा इससे कमतर का रूतबा किसी मंत्री या वज़नदार विधायक की कार का हो सकता है पर वह अकेला नहीं होगा उसके पहले पुलिस पोइलेट, क्लीयरिंग व्हीकल फिर मंत्री जी की गाड़ी होगी| विधायक अगर वज़न दार न हो तो उसका ड्रायवर ही टांय टांय का बतना दबाता रहेगा, पर रूतबा दबादब बनाया जाता रहेगा|  
इन्हीं दमदार मंत्री- नेताओं का एक और जन हितकारी रूप तब दिखता है जब राजनीति प्रेरित आन्दोलन सड़कों को रोक कर यातायात अवरुद्ध कर देता है| नेता अभिनेता मंत्री तो मंत्री, संतरी (पुलिस) की भी संवेदनशीलता को सांप सूंघ जाता है| असहाय रुदन सायरन बजाती ‘एम्बुलेंस’ को डायवेर्तेद रूट बता दिया जाता है,मैंने ऐसी भीड़ में फंसी ‘एम्बुलेस’ के मृत शरीर और बहते आंसुओं का अपने अस्पताल में सामना किया है| उफ्फ! हम कब सुधरेंगे|    
तीसरा दबदबा होता है कलेक्टर, कमिश्नर, पुलिस अफसर के ‘रुतबा-ए-बुलंद’ के द्रुत गति वाहनों के टौं टौं करते हवा मे उड़ते, सरे आम  यातायात नियमों को बला-ए-ताक़ रखते पुलसिया/भारत सरकार/मध्यप्रदेश शासन  वाहनों की लम्बी चौड़ी कतार के प्रशसनिक अधिकारियों के सायरनधारी वाहनों का| 
चौथी श्रेणी होती है क्लास फोर एम्प्लोयी की तरह ‘ एम्बुलेंस ‘ की जो अक्सर भीड़ से जूझती कातर स्वर सायरन बजाती, लाल नीली बत्ती जला कर किसी की जान का वास्ता देकर थोड़ी सी राह मांगती, पर वहाँ हर कोई उससे आगे निकलना चाहता हो जैसे उसमें किसी मरीज़ की उखड्ती साँसें नहीं एम्बुलेंस के आगे पीछे ठसा ठस वाहनों के अहं की मौत खड़ी हो और वाहन चालक एम्बुलेस का रास्ता रोक कर अपनी मौत से भाग रहे हों| वाजिब भी है ना ‘एम्बुलेंस‘ का रास्ता ‘सेनेटाइज़’ करने के लिए पुलिस की कतारें, बेरिकेड्स तो नहीं होते. ‘बिचारी एम्बुलेंस’ भी करे तो क्या करे उसके पास ना झंडा(हुकूमत की ताक़त) न डंडा( प्रशासनिक अधिकार) कहावत है “ग़रीब की लुगाई जगत की भौजाई”|
“जाके पैर ना फटी बिवाई वो क्या जाने पीर पराई”, ‘एम्बुलेंस’की वक़त-औकात सिर्फ या तो डाक्टर जानता है या जिस पर गुजरी हो वो जानता है| एक बार की बात है शायद 2004, मैं अपनी सरकारी क्लिनिक मैं बैठा ओ.पी.डी देख रहा था तभी एक महिला को कुछ लोग कार में ले कर आये| हालत बुरी थी, सांस जैसे उखड़ी सी थी| मेरी छोटी सी क्लिनिक में अधिक कुछ करने को न था, जैसे-तैसे उसकी उखड्ती सांस को थामने की  कोशिश की पर मरीज़ की जान बचने के लिए उसे बड़े अस्पताल में शिफ्ट करना ही एक रास्ता था| मरीज़ को स्टाफ की सहायता से एम्बुलेंस में शिफ्ट तो कर दिया पर एम्बुलेंस चलाएगा कौन? समस्या थी की एम्बुलेस ड्राइवर उस दिन छुट्टी पर था| हर सवाल से ऊपर लेकिन मरीज़ की जान थी| मैंने अपने क्लीनिक स्टाफ को मरीजों को समझाइश देने की हिदायत दी और पास के बड़े अस्पताल के सीनियर डाक्टर को सारा मसला समझाते हुए मरीज़ को लेने के इंतज़ाम करने का निवेदन किया| अन्ततः मारुती वेन एम्बुलेस में चाबी लगा कर खुद ड्राइवर बन गया और मरीज़ को ब-खैरियत अस्पताल पहुँचा दिया| अस्पताल में च्यूंकि पहले से बता दिया था मरीज़ को हाथों हाथ लिया गया| मरीज़ को वहां के डाक्टरों के हवाले कर मै वापस आ गया| बहुत तसल्ली हुयी कुछ तो सार्थक काम हुआ किसी की तो जान बची मेरी थोड़ी सी कोशिश से|
ऊपर की घटना 2004 की थी| 2024 जनवरी में गंभीर हालत में बिटिया को एक अस्पताल से दुसरे अस्पताल में शिफ्ट करना था| मुम्बई के ट्रेफिक में, उसकी हर सांस आख़िरी सी लग रही थी, टौंय टौंय  करती एम्बुलेंस भीड़ को चीरती जा रही थी| कोई रुकावट होती तो मन करता उतर कर ठोंक दिया जाय| ज़िन्दगी थोड़े समय में ही सारे अनुभव करा देती है| ठीक सात माह बाद मैं ख़ुद एम्बुलेंस में था हार्ट-अटैक में मरणासन्न, एक अस्पताल ने जवाब दे दिया था, बड़े अस्पताल मैं शिफ्ट किया रात के ढाई बजे सड़कों का सीना चीरती एम्बुलेंस मुझे लिए शहर की सड़कों पर दौड़ पड़ी| एक जगह सड़क मरम्मत के लिए टूटी-फूटी पड़ी थी, घुमाव (डायवर्सन) ले कर जाना पडा| मैं तो जानता नहीं पर मेरे होते सोते यानी ‘श्रीमती जी, साले, साहब मित्र आदि के मन में उठते भाव जो मैं सुन पाया या बाद मैं जान पाया,थे की उस सड़क इंजीनियर को, पूरे पी डब्ल्यू डी, नगर निगम को लाइनअप गोली मार दी जाय|
मरीज़ अस्पताल पहुंचाने तक वह एम्बुलेंस ‘उस क्षण राह की दरकार की भिखारी’ होती है, वही क्लास फोर की औकात| बात फिर रही सिर्फ एहसास की “जो एम्बुलेंस में होता है उसे एम्बुलेंस की वकत-औकात का एहसास होता है तब उनके लिए एम्बुलेंस “ज़िन्दगी की महारानी” बाकी के लिय तो मेहतरानी  यानी बे मतलब का शोर|  

 - कर्नल डॉ गिरिजेश सक्सेना
 भोपाल
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

Post a Comment

Previous Post Next Post