काव्य :
ग़ज़ल
तब सफ़र लम्बा हुआ
जब नया रस्ता चुना
ज़र ख़ुदा ने जब दिया
कर किसीका तो भला
तन बदन खस्ता हुआ
भूल जा अब दबदबा
देखता सपना बड़ा
है फटी जिस की कबा
वो न हरगिज़ भूलता
ज़ुल्म जिसने है सहा
भेदना है गर हदफ़
तीर जैसा सनसना
बीच में छोड़ा मकां
रह गया फिर अधबना
- हमीद कानपुरी
अब्दुल हमीद इदरीसी
मीरपुर कैन्ट कानपुर -208004
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काव्य
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