विशेष आलेख ∆
कविता की मूल शक्ति उसकी मानवीय संवेदना.......
- लाल बहादुर श्रीवास्तव, मंदसौर
प्रस्तुति डॉ घनश्याम बटवाल
हिंदी कविता अनेक आयामों का सफर तय करती हुई आगे बढ़ी है।यो तो छंद के अनुशासन को तोड़ने की परम्परा काफी पुरानी है किन्तु महाकवि निराला ने जिस तरह छंद के अनुशासन को तोड़कर हिंदी कविता को नई अर्थवत्ता प्रदान की,उसकी बड़ी समृद्ध परम्परा हिंदी कविता में प्रवाहमान रही है।निराला के बाद मुक्तिबोध,अज्ञेय,त्रिलोचन , नागार्जुन, केदारनाथ से लगाकर रघुवीर सहाय, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना,केदारनाथसिह , ऋतुराज,अरूण कमल,लीला जगूडी जैसे अनेक कवि हैं जिन्होंने छंद से कविता को तो मुक्त किया पर उसके कवितापन को खंडित नहीं होने दिया।इसका प्रमुख कारण यह था कि
ये कवि कविता के स्थापत्य को अच्छी तरह समझते थे और समझते हैं किंतु आज बहुत भारी मात्रा में जो कविता लिखी जा रही है उसमें कविता कितनी है और गधय कितना है यह भेद कर पाना बड़ा कठिन है।ऐसे में कविता बार बार लयात्मकता और गीतात्मकता की ओर लौटती है इसलिए हिंदी कविता के विकास के साथ हिंदी गीत की परम्परा भी अक्षुण्ण बनी रही है।
हिंदी गीतों के कवियों की बात करें तो ऐसे कवि गीतकार हैं जिन्होंने अपने सुमधुर गीतों से कवि सम्मेलन के मंचों पर गीत सुनाकर श्रोताओं को सुबह तक वाह वाही बटोरी है।नीरज ,गुलजार,बालकवि बैरागी,हरिओम पंवार ,संतोष आनंद, राजेन्द्र कृष्ण , विद्यापति,साहिर,शकील बदायूंनी,कैफ़ी आज़मी,मजरूह सुल्तानपुरी, शैलेन्द्र,आनंद बख़्शी,दिनकर, मैथिली चरण , कुमार विश्वास,मनोज मुंतशिर सुप्रसिद्ध गीतकार रहे हैं और है ।
आज गीतों को सबसे ज्यादा नुक्सान अगर किसी ने पहुंचाया है तो वो है हमारे मंचीय कवि सम्मेलन जिनमें आधुनिक कवियों ने गीतों के स्थान पर फ़ूहड़ गीतों की पैरोडी से कानों को सुनाया कम नचाया ज्यादा है।हिंदी का गंभीर गीतकार आधुनिक जीवन के सारे खुरदरेपन के साथ अपना रिश्ता रचनात्मकता के साथ जोड़ने का प्रयास करता रहा है। कविता को संवेदना के साथ गीतों की लयात्मकता से जोड़े रखना कवि के लिए बहुत जरूरी है ।
कविता की मूल शक्ति उसका मानवीय संवेदना के साथ जुड़े रहने में है और मानव भावों की सशक्त अभिव्यक्ति उनकी दृष्टि में किसी रचना की उत्कृष्टता का मानक हो सकता है उनकी चिंता उस कविता को बचाने की है जो जीवन मूल्यों की रक्षा के प्रति समर्पित है क्योंकी आपाधापी के इस युग में मूल्यहीनता हमारे जीवन की नियति बन गई है और कविता भी उसके साथ चलते रहने के लिए अभिशप्त हैं।कविता के गीत रूपों के गीतात्मक कविताओं में मन के भावों को पाठक तक,सरलता से पहुंचाने की क्षमता है तो जीवन को छलने वाले उपादानों पर प्रहार करने की ताकत है। प्रतीकात्मक ढ़ंग से कही बात भी बड़ी सहजता से सम्प्रेषित हो जाती है।
रचनात्मकता कभी थकती नहीं और विपरीत परिस्थितियों में तो वह प्रमुखता से मुखरित होती है। इसलिए कवि को विचार करना चाहिए कि कवि कर्म क्या केवल चारों और फैले कुहासे से आतंकित करने तक ही सीमित है।
कवि का धर्म कर्म उसकी श्रेष्ठ कविताओं गीतों से सांसो की तरह जीवनपर्यंत होना चाहिए। एक अच्छे कवि को अच्छी कृति के साथ अच्छी कविता में अच्छे गीतों में हमेशा उपस्थित रहना चाहिए।
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