वैचारिक चिंतन :
सद् गुण ही ज्ञान है
प्रकृति त्रिगुणमयी है (1)सत् (2) रज (3) तम । सत तत्व शांत और ज्ञान है ।
रज गुण में क्रियाशीलता है जब कि तम गुण आलस्य और अज्ञानता का प्रतीक है । गुण व्यक्ति की विशिष्टता में स्वयं ही परिलक्षित होते हैं ।यह उसका मूल स्वभाव बतलाता है कि व्यक्ति किस गुण से प्रभावित है । हमारी सनातन भारतीय संस्कृति में सतोगुण को सदा ही सर्वोच्च प्राथमिकता प्राप्त थी ।ऋषि मुनि सतोगुणी होने से समाज में श्रेष्ठ समझे जाते थे ।जब कि रजोगुणी क्रियाशीलता में क्षत्रियों को प्राप्त था जो अपनी शक्ति के बल पर समाज और राष्ट्र की रक्षाका दायित्व निभाते ।उनका मार्गदर्शन ऋषि-मुनि उन्हें ज्ञान प्रदान कर सदाचारी और सदगुणी बनाते थे ।जब कि तमो गुणी अज्ञानी होकर विध्वंस की लीला रचते । आज भी सदगुण का समाज में उतना ही महत्व है । आवश्यकता है इसको विचार में लाकर आचरण मे अपनाने की ।
विना सद् गुण के ज्ञान व सद्विचार के स्वतंत्रता अभिशाप है । ऐसा व्यक्ति विवेक हीन होकर स्वछंद और स्वेच्छा चारी होकर दूसरों पर अत्याचार करना अपना अधिकार समझने लगता है ।अंत में उसके ही कर्म उसे पतन के गर्त में धकेल कर उसका विनाश कर देतै हैं और तबउसकी मृत्यु पर रोने वाला भी कोई शेष नही बचता । सुकरात का यह कथन कि :-The Virtue is knowledge , अर्थात् सदगुण ही ज्ञान है सार्वभौमिक एवं सार्वकालिक सत्य है । सदगुणी व्यक्ति नैतिक और सदाचारी होने के कारण वह सबसे बड़ा ज्ञानी होता है क।यों कि उसे अच्छे और बुरे का भेद मालूम है वह सत्य के सबसे अधिक निकट होता है इसलिए सत्य ही उसका परम लक्ष्य होता है ।अपने आचरण और व्यवहार में वह कभी अन्यायी अथवा अत्याचारी नहीं होता । उसके सद्गुण का आधार ही उसकी नैतिकता होती है ।
- ऊषा सक्सेना-मुंबई
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