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व्यंग्य : मुकदमा कम्प्यूटर पर - डॉ कौशल किशोर श्रीवास्तव ,छिंदवाड़ा


 

व्यंग्य : 

मुकदमा कम्प्यूटर पर 
(भोपाल गैस त्रासदी की बरसी मुंह बाये मातम के रूप में खड़ी रहती है। शोक, संवेदनाएँ और श्रद्धांजलियां अपनी जगह हैं। मगर पूरे घटनाक्रम पर प्रस्तुत है यह प्रासंगिक व्यंग्य।)
  जय किशन जी का एक कारखाना चूहा मार दवा बनाने का भी था। उन्होंने उसमें इतनी चूहा मार दवा इक‌ट्ठी कर ली थी जितने कि पूरे देश में चूहे भी न थे। आखिरकार वही हो गया जो न होना था। दवा लीक कर गई।
सड़कों पर जो चूहा मार दवा ने बहना चालू किया तो आसपास के क्षेत्र में मरे हुए चूहों का ढेर लग गया। जो चूहे किसी तरह पिंजरों से बाहर निकल पाये वे सड़कों पर कुचल दिये गये। सब कुछ चुपचाप दफन हो जाता मगर बुरा हो कुछ लोगों का जिन्होंने चूहों के मरने पर तूफान उठा दिया। वहां के राजा को अखबार वालों पर वाजिब ही गुस्सा आया जिन्होंने चूहों की मौत पर छाती पीटना चालू कर दी। फिर छाती पीटने का सिलसिला जो चला तो पत्रिकाओं, सभाओं, टेलीविजनों, और विदेशों तक में पसर गया। अब चक्रवर्ती कुनमुनाया। उसने पहले तो राजा को डांटा फिर कहा कि हमें यह देखना है कि चूहे को ठिकाने लगाने में जो खर्च हुआ है उसका दावा ठोंक दो। (वह ऐसे ही बोलता था) लोग अपनी छाती पीटना रोककर तुम्हारी पीठ ठोंकना चालू कर देंगे। यह तय करने के पश्चात कि मुकदमा यहीं चलेगा। मुकदमे का आधार बनाना चालू किया गया। राजा के राज में जब आदमियों का इलाज ही चूहों की तरह होता था तो चूहों का रिकार्ड कहां से रखा जाता ? अतः ऊपरी आमदनी पर चलने वाले सरकारी डाक्टरों और कानून दाओं को पन्ने भरने के लिए राजधानी में भर लिया गया। मगर राजा की तरह ही उसके नौकर थे, उन्हें काम करने की आदत नहीं थी और बगैर रिश्वत लिये तो बिल्कुल नहीं। ड्राई एरिया उन्हें लगा। वहाँ जयकिशन इस बात से बहुत खुश हुआ कि चूहों की मौत का रास नहीं आया। वे खबरचियों के दफ्तर पहुंच गये। फिर हल्ला होने मुकदमा उन्हीं के देश में चलेगा। इसी खुशी में उसने कम्प्यूटर पर इस केस के तमाम डाटा फीड किये तो परदे पर यह फिल्म चालू हो गई। "तुम्हारा नाम ?" वकील साहब ने पूछा, "जी गरीब चंद गवाह ने हाथ जोड़कर जवाब दिया। 'तुम्हें किसने बतलाया कि तुम्हारा नाम गरीब चंद है ? वकील साहब ने आक्रमण किया । आब्जेक्शन योर आनर सरकारी वकील ने जागकर जम्हाई ली। "हर चूहे का नाम यही होता है उसे सब गरीब चंद ही कहते हैं।' "बहुत खूब" कल सब कहेंगे. की जय किशनजी का कारखाना राजधानी में था तो आप मान लेंगे। बचाव पक्ष व्यंग्य से बोला। तो क्या जयकिशन जी का कारखाना राजधानी में नहीं था ? सरकारी वकील ने अचकचा कर कहा। यह तो आपको सिद्ध करना है। उसके बाद ही यह प्रश्न उठेगा कि अमुक तारीख को चूहा मार दवा लीक हुई थी या नहीं ? फिर हम साल पर तारीख पर और महीने पर बहस करेंगे। उसके बाद भिन्न प्रकार की चूहामार दवाओं पर बहस करेंगे। अभी तो आपको यह सिद्ध करना है कि उक्त कारखाना क्या है, और कहाँ है ? बचाव पक्ष ने कारखाने के आगे खड़े होकर कहा। साल भर बाद बहस आगे सरकी। "तो गरीब दास जी आप कहां रहते हैं ?" बचाव पक्ष के सांड ने पूछा।
'जी जय किशनजी के कारखाने के पास। गरीब रिरआया। 'मेरे मुवक्कल के घर के अन्दर ?" प्रश्न उछला । "जी नहीं", "उसकी छत पर", "जी नहीं", "तो फिर उसके पास कैसे हुये ?" गरीब चुप। "तो योर आनर यह सिद्ध हुआ कि कथित घटना के दिन जयकिशन जी के पास कोई नहीं रहता था।" बचाव पक्ष ने एक निर्णय लिखवाया। इस तरह बहस दूसरे साल में घुस गई। "हाँ, तो गरीबलाल," बचाव पक्ष घूमा। "जी मेरा नाम गरीब चंद
है। "कोई फर्क नहीं पड़ता। गरीब के आगे कुछ भी लगाओ वह गरीब ही रहता है।" "है, है, है' गरीब चंद ने जवाब दिया । "तो गरीबलाल जी आपने वहां की जमीन पर रहने के लिए पट्टा लिया था ?" जी नहीं। इतने में आँख पर पट्टी वाली कुर्सी बोली, 'पट्टी से क्या होता है? पट्टी के पीछे क्या है ?" "पट्टी नहीं पट्टा-योर आनर, जिसके गले में पट्टा नहीं होता उसका कर्तव्य है कि वह दुम दबा कर भागे और जिसके गले में पट्टा होता है उसे गुर्राने का हक होता है।" बचाव पक्ष ने आगे कहा। "अब मैं पैसा, इकट्ठा करने वाले विभाग को तलब करना चाहूंगा।" "इजाजत है आपको हर चीज की इजाजत है। हमारे यहां मरने वालों को सफाई का मौका नहीं दिया जाता है मारने वालों को हर मौके दिये जाते हैं।" यह प्रकाशित कर कुर्सी फिर सो गई। "तो पटवारी जी, आपने इन चूहों को अतिक्रमण हटाने के नोटिस दिये थे।" बचाव पक्ष ने सलाह दी। "हाँ हुजूर इंन नोटिसों पर इन चूहों के अंगूठे लगे हैं। रेवेन्यू डिपार्टमेंट जय किशन के पक्ष में बोला । "क्यों बे चूहों, इन नोटिसों की प्राप्ति पर तो तुम्हारे पैर के अंगूठे लगे हैं।" बचाव पक्ष ने सीने पर प्रश्न अड़ा दिया। "जी पटवारी साहब, दुर्घटना के बाद आये और इन्होंने कहा कि देखो इन कागजों पर हम तुम्हारी तरफ से अंगूठे लगवा देते हैं तो तुम्हे पैसा मिलेगा। हमने कहा हमें पढ़ना नही आता हुजूर।" चूहे समवेत स्वर में बोले।
"मूर्खी। जब पढ़ना नहीं आता तो हमारे बीच में रहने क्यों आये ?" न्यायालय में समवेत स्वर में हंसी के साथ आवाज आई। इस तरह साल पीछे सरकते गये और मुकदमा आगे सरकता गया। "तो घसीटे" घटना के दिन तुम क्या कर रहे थे । "जी उस समय दिन नहीं था रात थी गरीब बोला मतलब तुम सो रहे थे। तुम नहीं बतला सकते कि उस रात को क्या हुआ था।" फटेहाल ने कहा "जी गैस रिसी थी।" "तुमने गैस देखी थी ?" षडयंत्र ने पूछा। 'जी गैस दिखती नहीं है।" "तब तुम कैसे कह सकते हो कि वह चूहामार गैस थी। गोबर गैस नहीं थी ?" अदृश्य प्रश्न गूंजा । चूहा चुप रहा । "तुम्हारा मुहल्ला गन्दा रहता है ?" बचाव पक्ष ने कीलें ठोकना चालू किया। 'जी आस पास सूअर रहते हैं ?" "जी!" "कचरा रहता है? "मक्खी मच्छर रहते हैं।" जी!" "आसपास धूल उड़ती है।" "जी" "इन सब चीजों से तुम्हारा दम नहीं घुटता" "जी! घुटता रहता है" अब बचाव पक्ष योर आनर के तरफ मुड़ा । "नोट किया जाये' योर आनर कि इन चूहों का दम तो घुटता ही. रहता है। मगर चूंकि दुर्घटना के दिन प्रशासन की गलती से नहीं घुटा। अतः प्रशासन ने एक व्यापारी पर प्रतिशोधवश यह मुकदमा दायर कर दिया।" "योर आनर, मौत चूहों की हुई है और मुआवजा राजा मांग रहा है। यह प्राकृतिक न्याय के खिलाफ है। अतः मेरे मुवक्किल को बाइज्ज्त बरी किया जावे और उन्हें राज्य के हर जिले में गैस चेम्बर बनाने की इजाजत दी जाये। मैं इन मुकदमों की आखिरी कील आपके हाथों में सौप रहा हूँ।" इसके बाद जयकिशन जी को बाइज्जत बरी कर चूहों की सामूहिक कब्र पर आखिरी कील ठोक कर काजी ने अपने हाथ धो लिये। दस वर्ष बाद चूहामार कारखाना आसपास की झोपड़ियों को निगलकर दुगना मोटा हो गया और हजारों चूहों का श्राद्ध संतुष्टों और असंतुष्टों को साल दर साल मिलता रहा।

 - डॉ कौशल किशोर श्रीवास्तव
171 विशु नगर परासिया मार्ग छिंदवाड़ा 
मध्यप्रदेश 
मोबाइल9424636145
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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