आज की समृद्धि, कल की कीमत: वैश्विक कर्ज का सच
[वैश्विक कर्ज संकट: भविष्य की नीतियों पर बढ़ता बोझ]
[विकसित से विकासशील तक: वैश्विक कर्ज का फैलता जाल]
इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में वैश्विक अर्थव्यवस्था एक ऐसे मोड़ पर आ खड़ी हुई है, जहां विकास की गति से अधिक तेज़ी से कर्ज का पहिया घूम रहा है। दुनिया का कुल सार्वजनिक कर्ज 100 ट्रिलियन डॉलर की ऐतिहासिक सीमा पार कर चुका है, जो अब वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 94.7 प्रतिशत के बराबर है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुसार यह आंकड़ा 2025 में लगभग 111 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया है और यदि मौजूदा प्रवृत्तियां जारी रहीं, तो 2029 तक यह जीडीपी के 100 प्रतिशत को पार कर सकता है (प्रतिकूल स्थिति में 115-123% तक)। यह स्थिति केवल आर्थिक आंकड़ों की बात नहीं है, बल्कि यह वैश्विक वित्तीय स्थिरता, सामाजिक संतुलन और राजनीतिक निर्णय क्षमता के लिए एक गंभीर चेतावनी बन चुकी है। कर्ज अब केवल विकास का साधन नहीं, बल्कि भविष्य की नीतियों पर बोझ बनता जा रहा है।
विकसित अर्थव्यवस्थाओं में यह संकट और भी गहराता दिख रहा है। अमेरिका, यूरोप और जापान जैसे देशों में सार्वजनिक कर्ज जीडीपी के 110 प्रतिशत के आसपास पहुंच चुका है। अकेले अमेरिका का राष्ट्रीय कर्ज 38.5 ट्रिलियन डॉलर के करीब है, जहां सालाना ब्याज भुगतान लगभग 1 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच चुका है यह राशि कई देशों के कुल रक्षा बजट से भी अधिक है। ओईसीडी की रिपोर्ट चेतावनी देती है कि सरकारों का बढ़ता ब्याज व्यय अब शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे जैसे उत्पादक क्षेत्रों के लिए उपलब्ध संसाधनों को निगल रहा है। जब सरकारें कर्ज चुकाने में अधिक धन खर्च करती हैं, तो विकास निवेश स्वाभाविक रूप से सिमट जाता है, जिससे दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता खतरे में पड़ जाती है।
इस वैश्विक कर्ज संकट की जड़ें हाल के वर्षों की असाधारण घटनाओं में छिपी हैं। कोविड-19 महामारी ने सरकारों को अभूतपूर्व स्तर पर उधार लेने के लिए मजबूर किया। स्वास्थ्य प्रणालियों को संभालने, लॉकडाउन के दौरान अर्थव्यवस्था को जीवित रखने और सामाजिक सहायता योजनाओं को चलाने के लिए ट्रिलियनों डॉलर के प्रोत्साहन पैकेज जारी किए गए। इसके तुरंत बाद रूस-यूक्रेन युद्ध ने ऊर्जा और खाद्य संकट को जन्म दिया, जिससे सब्सिडी और रक्षा खर्च में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई। इन दोनों घटनाओं ने राजकोषीय संतुलन को पूरी तरह बिगाड़ दिया। नतीजा यह हुआ कि ओईसीडी देशों में ब्याज खर्च जीडीपी का 3.3 प्रतिशत तक पहुंच गया, जो अब रक्षा व्यय से भी अधिक है।
विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की स्थिति और भी नाजुक है। इन देशों पर कुल कर्ज लगभग 31 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच चुका है और वे हर साल करीब 921 अरब डॉलर केवल ब्याज भुगतान में खर्च कर रहे हैं। ऊंची वैश्विक ब्याज दरें और कमजोर आर्थिक वृद्धि इस संकट को और गहरा कर रही हैं। आईएमएफ की रिपोर्ट बताती है कि कॉर्पोरेट और सरकारी बॉन्ड मिलाकर वैश्विक बॉन्ड बाजार 100 ट्रिलियन डॉलर से अधिक का हो चुका है, जिससे रिफाइनेंसिंग जोखिम खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। उभरते बाजारों में विदेशी पूंजी का बहिर्वाह, मुद्रा अवमूल्यन और भुगतान संतुलन संकट की आशंका लगातार बढ़ रही है।
आने वाला वर्ष 2026 इस संकट का निर्णायक पड़ाव साबित हो सकता है। अनुमान है कि बढ़ता कर्ज वैश्विक आर्थिक विकास दर को लगभग 3.2 प्रतिशत पर सीमित कर देगा। उभरते बाजारों में करीब 8 ट्रिलियन डॉलर के बॉन्ड रिडेम्प्शन की चुनौती सामने होगी, जिससे कई देशों की मुद्राएं दबाव में आ सकती हैं। अमेरिका में सार्वजनिक कर्ज जीडीपी के 102 प्रतिशत तक पहुंचने की संभावना है, जहां ब्याज भुगतान संघीय बजट का लगभग 17 प्रतिशत हिस्सा निगल सकता है। यूरोप में पेंशन और स्वास्थ्य सेवाओं पर कटौती का खतरा मंडरा रहा है, जबकि एशिया में चीन का बढ़ता उधार उसकी विकास गति को सुस्त कर सकता है। आईएमएफ चेतावनी देता है कि प्रतिकूल परिस्थितियों में वैश्विक कर्ज जीडीपी के 115 प्रतिशत तक जा सकता है, जो एक नई वैश्विक मंदी को जन्म दे सकता है।
नकारात्मक परिदृश्य में वैश्विक वित्तीय बाजारों में बड़ा संकट भी संभव है। अंतरराष्ट्रीय वित्त संस्थान की रिपोर्ट के अनुसार लगभग 16 ट्रिलियन डॉलर का रिफाइनेंसिंग संकट विकसित बाजारों को हिला सकता है। यदि निवेशकों का भरोसा डगमगाया, तो शेयर और बॉन्ड बाजारों में भारी गिरावट देखी जा सकती है, जो 2008 की वित्तीय मंदी से भी अधिक गहरी हो सकती है। विकासशील देशों में बेरोजगारी, महंगाई और सामाजिक अस्थिरता बढ़ने का खतरा है, जबकि अमीर देशों में आय और संपत्ति की असमानता और तेज हो सकती है। भू-राजनीतिक तनाव पूंजी प्रवाह को बाधित करेंगे, जिससे उधार और महंगा हो जाएगा और संकट का दायरा और फैल जाएगा।
इतिहास गवाह है कि जब कर्ज पर से नियंत्रण फिसलता है, तो उसके झटके केवल अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं रहते, बल्कि समाज और राजनीति की नींव तक को हिला देते हैं। ग्रीस और इटली जैसे देशों के कर्ज संकट ने यह कड़वा सच उजागर किया है कि वित्तीय असंतुलन कैसे वर्षों तक विकास की गति को जकड़े रखता है और नीतिगत विकल्पों को सीमित कर देता है। लेकिन आज का वैश्विक संकट इन उदाहरणों से कहीं अधिक व्यापक और जटिल है, क्योंकि विश्व की अर्थव्यवस्थाएं अभूतपूर्व स्तर पर आपस में जुड़ चुकी हैं। ऐसे में यदि बड़ी अर्थव्यवस्थाएं डगमगाती हैं, तो उसकी कीमत छोटे और कमजोर देशों को कहीं अधिक भारी रूप में चुकानी पड़ती है।
इस संकट से बाहर निकलने के लिए अब ठोस और साहसिक कदम जरूरी हैं। आईएमएफ और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं कर सुधार, व्यय नियंत्रण और कर्ज को जीडीपी के 100 प्रतिशत से नीचे लाने की सलाह दे रही हैं, लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी सबसे बड़ी बाधा है। डिजिटल मुद्राएं और ब्लॉकचेन जैसी तकनीकें उधार प्रक्रिया में पारदर्शिता ला सकती हैं, जबकि सस्टेनेबल और ग्रीन बॉन्ड भविष्य के विकास को अधिक जिम्मेदार दिशा दे सकते हैं। विकासशील देशों के लिए ऋण राहत, पुनर्गठन और निवेश प्रवाह बेहद आवश्यक है। यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो यह कर्ज संकट केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और मानवीय संकट का रूप ले सकता है, जो आने वाली पीढ़ियों पर गहरा प्रभाव छोड़ेगा।
- प्रो. आरके जैन “अरिजीत”, बड़वानी (मप्र)
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