काव्य :
ऋतुराज बसंत पर्व पर,
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मधु चंद्र दिग्दिगंत..
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इंजी. अरुण कुमार जैन
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महके देह चन्दन सी,
पुष्प, अधरों पर अनंत, मदिरा छलकायें नयन,
लो अब आया बसंत |लो अब...
कोयल कंठ आन बसी,
बौराया अंग-अंग,
कपोलों पर अरुणिमा,
लो अब आया बसंत |लो अब आया..
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रति जैसा रोम -रोम,
अलकों में हैं मिलिंद,
नूपरों में सप्त स्वर,
लो अब आया बसंत|
लो अब आया..
देह पूनम निशा सी,
झरनों सा मृदुल कंठ,
अपलक निहारुं बस,
लो अब आया बसंत |
लो अब...
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दहकी देह गुलमोहर,
छुआ, बज उठे मृदंग,
बोझिल, मदमाते नयन,
लो अब आया बसंत |
लो अब...
अधर मिले अधरों से,
मधु चंद्र दिग्दिगंत,
शांति, तृप्ति, चैन मिला,
लो अब आया बसंत |
लो अब आया....
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