बात
बात निकलेगी तो बहुत दूर तक जाएगी,बातें हैं बातों का क्या, मतलब की बात करूं तो ही इस लघु लेख का औचित्य लगे।
बात समझने , बात रखने और बात मनवाने की ,सभी की कला में दक्षता ,निपुणता,भाषा,शैली और ज्ञान महत्वपूर्ण है,यदि ज्ञान में कमी हो,विषय की अनभिज्ञता हो तो उचित यही होगा कि बातों को विराम दिया जाए।
बातों में स्पष्टता,मधुरता रखना भी,श्रेष्ठता होती है,इसे अनुभव,उम्र और धैर्य से सीखा जा सकता है।
कम शब्दों में भी बातों को रखना एक कला है।बातों का अनुचित विस्तार भी नहीं होना चाहिए ।बातों को रुचिकर बना कर बात करने से,बात बन जाती है कई बार।एक बात और की जाए कि, कटु सत्य, अप्रियकर हो सकता है किंतु सत्य की भी अपनी शक्ति होती है।यथा संभव विनम्रता से बात की जाए तो सुनने वाले में अधिकांशतः रोष पैदा नहीं होता है।
बात यों की जानी चाहिए कि आपका व्यक्तित्व झांकता मिले। एक बात और है फोन पर बात करने में भी यथासंभव मृदुता और माधुर्य रखा जाए तो अच्छा होता है क्योंकि सुनने वाला आपको देख नहीं रहा है आपकी बातों से ही आपकी छवि का आकलन हो जाता है।
बात पर बहुत बातें कहने का मन होता है किंतु लघु लिखूं और उचित भी लिखूं,तभी उचित होगा।
सार्वजनिक रूप से जब आप वक्ता होते हैं तो सभी की आंखों में देखकर और तेज आवाज में बोला जाए तभी अंतिम पंक्ति तक आपकी बात पहुंचती है।
एक और बात याद आई बातें कम हों और काम ज्यादा,इसी में सार्थकता है।
हमेशा ध्यान रखने की बात ये है कि बात न बिगड़े,बल्कि बात बन जाए,जहां उचित न हो वहां बात करने से बाज आएं।
एक मधुर गीत याद आ रहा है जाते जाते अंत में,बातों बातों में हम तुम हो गए दीवाने
- डॉ ब्रजभूषण मिश्र, भोपाल
.jpg)
