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काव्य : गीत रितु बसंत - श्यामा देवी गुप्ता दर्शना भोपाल


 काव्य : 

गीत

रितु बसंत

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शरद कामिनी रितु बसंत का,

 करें धरा अभिनंदन।

वसुधा की हर कली-कली में,

खिला आज नवयौवन।।


प्रीति पाँवड़े बिछा- बिछाकर,

हर्षित झूमें  मधुवन।

कुंज लताएँ अपलक देखें,

सुखद भोर के आनन।।

स्वर्णिम सी आभा बिखरी है,

चमक रहे बन कुंदन।।


शरद कामिनी रितु बसंत का,

करें धरा अभिनंदन।।


तरुण आम्र की ये मंजरियाँ,

करती मिल गुनगुन।

टेसू फूले -फूले दहकें,

त्याग सभी से अनबन।।

बसंती पुरवाई चलें जब,

लगते सब वृंदावन।।


शरद कामिनी रितु बसंत का,

करें धरा अभिनंदन।।


पुलकित होकर महक उठा ये

प्राची का अनुबंधन।

नवअंकुर भी स्वप्न संजोता,

भूल गया अवगुंठन।।

रंगीला रितुराज महकता,

करता नित नित वर्धन।।


शरद कामिनी रितु बसंत का,

करें धरा अभिनंदन।।


 - श्यामा देवी गुप्ता दर्शना भोपाल 


देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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