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साहित्य से राष्ट्रीय चेतना बना गीत वंदे मातरम् - विवेक रंजन श्रीवास्तव , भोपाल


 

साहित्य से राष्ट्रीय चेतना बना गीत 

वंदे मातरम् 

 - विवेक रंजन श्रीवास्तव , भोपाल

   भारतीय राष्ट्रीय चेतना के सबसे प्रबल और प्राणवान मंत्र "वंदे मातरम" ने २०२५ में अपनी १५०वीं वर्षगाँठ मनाई। ७ नवंबर १८७५ को बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित यह गीत केवल साहित्यिक रचना नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक-सांस्कृतिक धारा बन गया, जिसने देश के स्वतंत्रता संग्राम से लेकर आधुनिक राष्ट्र-निर्माण तक की यात्रा को सहर्ष आलोकित किया है। इसकी यात्रा साहित्यिक पत्रिका 'बंगदर्शन' के पन्नों से आरंभ होकर बंकिमचंद्र के उपन्यास 'आनंदमठ' (१८८२) तक पहुँची और फिर गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा संगीतबद्ध होकर एक जन-जन का गीत बन गई। इसकी प्राण-शक्ति इतनी प्रबल थी कि यह शीघ्र ही औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध प्रतिरोध का प्रतीक बन गया। १९०५ के बंग-भंग के विरोध में यह जनांदोलनों का मुखर स्वर बना और अंग्रेजी सत्ता के लिए एक चुनौती बनकर उभरा। इसकी एकजुट करने की क्षमता को देखते हुए ही १९३७ में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इसके पहले दो पदों को राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया, और स्वतंत्रता के बाद १९५० में इसे राष्ट्रगान 'जन गण मन' के समकक्ष राष्ट्रीय गीत का सम्मान प्रदान किया गया।

स्वतंत्रता के बाद के दशकों में भी 'वंदे मातरम' की प्रासंगिकता कम नहीं हुई। यह राष्ट्रीय एकता और अखंडता के प्रतीक के रूप में सदैव प्रासंगिक बना रहा। यह गीत हमें स्मरण कराता है कि राष्ट्र की अवधारणा किसी एक धर्म, भाषा या संप्रदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सभी को समेटने वाली मातृभूमि की भावना है। १५०वीं वर्षगाँठ के अवसर पर देशव्यापी समारोहों, विशेष डाक टिकटों एवं स्मारक सिक्कों के जारी होने तथा शैक्षणिक संस्थानों में आयोजनों ने इसके ऐतिहासिक महत्व को पुनर्स्थापित किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा एक वर्ष लंबे स्मरणोत्सव का उद्घाटन इसके प्रति राष्ट्रीय श्रद्धा का प्रमाण था।

समकालीन डिजिटल युग में नई पीढ़ी के सामने यह चुनौती और अवसर दोनों है कि वह इस ऐतिहासिक धरोहर के गहन अर्थ को समझे। सोशल मीडिया, डिजिटल प्रदर्शनियों और ऑनलाइन प्रतियोगिताओं के माध्यम से इस गीत को नए संदर्भों में प्रस्तुत किया जा रहा है, जिससे युवाओं तक इसकी पहुँच बढ़ी है। युवा पीढ़ी के लिए यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि एक विचार है , एक ऐसे भारत का विचार जो अपनी संप्रभुता, सांस्कृतिक धरोहर और प्रगतिशील भविष्य के प्रति सजग है। यह उन्हें राष्ट्रभक्ति की उस भावना से जोड़ता है जो आत्मनिर्भरता, कर्तव्यबोध और सामूहिक उत्तरदायित्व पर आधारित है।

वंदे मातरम की १५० वर्षों की यात्रा भारत के आधुनिक इतिहास की एक झलक है। यह साहित्य से उठकर राजनीति में आया, एक राष्ट्रीय आंदोलन का मंत्र बना और अंततः राष्ट्रीय पहचान का अविभाज्य अंग बन गया। आज भी यह गीत हमें सिखाता है कि राष्ट्रप्रेम का अर्थ अतीत का सम्मान, वर्तमान की सक्रिय भागीदारी और भविष्य के प्रति सजगता है। यह मातृभूमि के प्रति श्रद्धा का वह अमर स्वर है जो सदियों तक भारत की आत्मा को गौरवान्वित करता रहेगा।

 - विवेक रंजन श्रीवास्तव

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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