संस्मरण :
धुंधली यादें ,गीतकार/ ग़ज़लकार
नीरज जी
बात 80 के दशक की है,मैं अपने एक मित्र के साथ साईंबाबा के दर्शन हेतु शिर्डी गया था।मनमाड स्टेशन से पंजाब मेल से बापसी का आरक्षण था।गाड़ी के आने पर हम लोग आरक्षित डिब्बे में यथा स्थान बैठ गए।मेरी व मित्र दोनों की लोअर बर्थ थी।एक सज्जन जो ऊपर वाली बर्थ पर लेटे थे आतुरता से मेरी और देख रहे थे,गाड़ी के मनमाड स्टेशन से रवाना होते ही उन सज्जन ने विनम्रतापूर्वक मुझसे कहा कि बेटा में अस्वस्थ हूं, यदि आप नीचे की बर्थ दे देंगे तो मेरे लिए सुविधाजनक होगा। मैंने कहा ले लीजिए मुझे कोई दिक्कत नहीं।वे सज्जन नीचे आ गए उनके सामनेवाली बर्थ पर हमलोग बैठ गए।
चंद मिनटों में ही बातचीत का दौर चल पड़ा।हम लोग ने अपना परिचय दिया,तदोपरांत वे सज्जन बोले --आपने "नई उमर की नई फसल"फ़िल्म देखी क्या--हाँ में प्रतुत्तर सुन बोले फिर तो गाना भी सुना होगा-- कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे--- मैं रचयिता हूँ इस गीत का, ***अरे नीरज सर हमलोगों के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ पड़ी । फिर क्या-- उन्होंने गीत और ग़ज़लों से झांसी तक का सफर बहुत छोटा कर दिया।
आज भी जब याद करता हूँ आंखे नम हो जाती है।
ऐसा गीतकार गजलकार जिसने अपनी लेखनी से हिंदी साहित्य,बॉलीवुड को नए आयाम दिए,उन्हें नमन करता हूँ।
- हरीश श्रीवास्तव , भोपाल
.jpg)
