काव्य :
हे हंस वाहिनी !
मातु विनत वंदना हमारी
तुम्हे समर्पित ह्रुदयांतर से ,मातु विनत वंदना हमारी,
अक्षर अक्षर बांध लिया है ,भाव- सुमन मुक्ताहारों से,
स्वर वैभव के गीत रचाकर ,सरगम के स्नेहिल तारों से
विश्वासों का दीप जलाये ,मातु सहज प्रार्थना हमारी .
मातु विनत वंदना हमारी
पाँव भटकतेजग-अरण्य में,मन बोझिल और पथ दुर्गम है,
लक्ष्य शिखर को छू पाना भी,शूल वेदना सा निर्मम है,
एक आशा अभिलाष जगाये ,मातु सरल कल्पना हमारी,
मातु विनत वंदना हमारी-
जीवन के अंधियारे तम में ,पथ मेरा आलोकित कर दो,
आज लेखनी के शब्दों में ,नवल चेतना ,ज्योति-प्रखर दो,
आंसू से भीगे गीतों में ,भाव करुण दो,नूतन-स्वर दो,
अनुरागी मन की कविता में मातु मुखर कामना हमारी
मातु विनत वंदना हमारी।
(2)
-तुम छू लो कंचन हो जाऊं
(तुम पारस मैं अयस अपावन,तुम छू लो कंचन हो जाऊं.
अक्षर अक्षर बांध लिया है ,स्नेह सुमन मुक्ताहरों से,
अब मन का आकाश खुला है,तुम आओ पावन हो जाऊं.।
अंतर अंतर भींग रहा है,नेह-वारी के भावकणों से,
.माँ नयनों में आंसू बन कर बरसों तुम, मधुमय हो जाऊं।
जग सोता है घोर तिमिर में ,मेरे नयन जागृत रहते,
मधुर कल्पना के पंखों पर, स्वप्न हजारों तिरते रहते.
एकाकी मन के त्रिभुवन में ,ज्योतिर्मय तुम,दीप जलाऊँ।
मेरी सृजन शक्ति की राहें,निर्भय हों,उन्मुक्त गगन दो,
पथ के सरे शूल सरल हों,मानवता का पथ निर्मल दो,
बन चन्दन-की गंध पावनी,परसों मन, सुरभित हो जाऊं।
- पद्मा मिश्रा , जमशेदपुर
.jpg)
