असमय जाना एक कर्मयोगी का
- डॉ. विपिन पवार
दिनांक 28 जनवरी, मंगलवार की सुबह लगभग 9:30 बजे बारामती के पास स्थित दौंड जंक्शन से राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता मेरे चचेरे भाई ने एक चौंकाने वाली अत्यंत दुखद सूचना दी कि अजित दादा नहीं रहे । उनका प्लेन क्रैश हो गया है। मराठी में बड़े भाई को दादा कहा जाता है और महाराष्ट्र के लाडले नेता वित्त मंत्री अजित पवार (उपमुख्यमंत्री इसलिए नहीं कहूंगा क्योंकि यह कोई संवैधानिक पद नहीं है) संपूर्ण महाराष्ट्र के लोकप्रिय दादा थे।
हवाई दुर्घटना में काल-कवलित हो जाना इस देश के लिए कोई नई बात नहीं है । इसके पूर्व भी सन 1965 में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री बलवंतराय मेहता, सन 1980 में संजय गांधी, सन 2001 में माधवराव सिंधिया, सन 2002 में तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष डॉ. जी.एम.सी. बालयोगी, सन 2004 में मेघालय के ग्रामीण विकास मंत्री सिप्रियान संगमा, सन 2005 में उद्योगपति और हरियाणा के मंत्री ओमप्रकाश जिंदल एवं कृषि मंत्री सुरेंद्र सिंह, सन 2009 में आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री वाई.एस. राजशेखर रेड्डी, सन 2011 में अरुणाचल प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री दोरजी खांडू, और गत वर्ष सन 2025 में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय रुपाणी के अलावा सन 1966 में सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक होमी भाभा, सन 2004 में अभिनेत्री के. एस. सोमैया और सन 2021 में चीफ ऑफ़ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत ने भी हवाई दुर्घटना में अपने प्राण गंवाए हैं।
जिसने इस पृथ्वी पर जन्म लिया है, एक न एक दिन उसे उस अनंत यात्रा पर निकल जाना है , जहां से उसे कभी भी लौटकर नहीं आना है। आधिकारिक तौर पर तो राज्य में तीन दिन के राजकीय शोक की घोषणा की गई है, लेकिन कल 28 जनवरी की सुबह से ही माहौल में एक मुर्दनी सी छाई है, धूप का नामोनिशान नहीं है, लोगों ने स्वत:स्फुर्त अपनी-अपनी दुकानें बंद रखी है। सड़कों पर इस तरह का सन्नाटा है, जैसे कर्फ्यू लगा हुआ है। सुबह सैर करने वाले लोगों के चेहरे गमगीन हैं ,जैसे उनके घर पर कोई मौत हो गई हो। लगभग हर चौराहे पर अजित दादा का फोटो लगा हुआ है । बड़े-बड़े पोस्टर और बैनर देखकर मुझे याद आता है कि दादा यह सब देखते तो उन्हें कितना दु:ख होता ? क्योंकि पालक मंत्री के नाते उन्होंने शहर में बड़े पोस्टर एवं बैनर लगाना प्रतिबंधित कर दिया था। अपनी 66 वर्ष 6 महीने और 6 दिन की जिंदगी में अजित पवार ने महाराष्ट्र एवं विशेष रूप से पुणे महानगर में विकास की जो गंगा बहाई है ,ऐसा पुणे पैटर्न कहीं और दिखाई नहीं देता। विगत 6 वर्षों में लगातार महाराष्ट्र सरकार का बजट प्रस्तुत करने का रिकॉर्ड उनके नाम पर है तो महाराष्ट्र में 10 बार बजट प्रस्तुत करने वाले वे एकमात्र वित्त मंत्री रहे हैं। पुणे और पिंपरी चिंचवड़ महानगर के समन्वित विकास हेतु उनके द्वारा बनाई गई दीर्घकालीन योजनाओं का ही परिणाम है कि आज पुणे महानगर विश्व के विख्यात महानगरों की बराबरी में आकर खड़ा हो चुका है। पुणे जिले के पालक मंत्री होने के नाते वे प्रत्येक शुक्रवार को समीक्षा बैठक आयोजित करते थे। पुणे मेट्रो रेल, फ्लाय ओवर्स, पुणे सड़क परिवहन, सरकारी इमारतों का कायाकल्प, पुणे का नया द्वितीय अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, शहर की साफ सफाई एवं पर्यावरण, जल संसाधन, तीर्थ क्षेत्र विकास, पुलिस एवं राजस्व विभाग का सशक्तिकरण, महिलाओं के लिए लाडली बहन एवं गुलाबी ऑटो रिक्शा योजना और शहर में सांप्रदायिक सौहार्द को बनाए रखना आदि कुछ ऐसे कार्य हैं, जिनके कारण अजित दादा पुणेवासियों के मन में हमेशा अमर रहेंगे। कृषि, सहकारिता, जल संसाधन, ऊर्जा संरचनागत सुविधा आदि महत्वपूर्ण विषयों के विशेषज्ञ अजित पवार रात को ठीक 11:00 बजे सो जाते थे तथा 05:30 बजे उठने के बाद व्यायाम आदि से निवृत होकर 6:30 बजे समाचार पत्रों का अवलोकन कर 8:00 बजे से जो काम में लग जाते थे, तो लगातार रात 10:00 बजे तक काम करते रहते थे। कुछ लोग उनके अत्यंत कठोर अनुशासन एवं कड़ी जुबान के कारण उन्हें पसंद नहीं करते थे , पर जिन्होंने अजित पवार का ह्यूमर देखा है, उनकी आंखों की नमी सूख नहीं पा रही है।
उनकी आमसभाओं में जबरदस्त भीड़ हुआ करती थी। आमसभाओं में जब वे ठेठ मराठी में कोई जुमला उछाल देते थे ,तो बहुत देर तक भीड़ की हंसी थम नहीं पाती थी। हिंदी और अंग्रेजी से वह दूरी बना कर रखते थे लेकिन मराठी पर उनका जबरदस्त अधिकार था। उनके कुछ लोकप्रिय जुमले थे .... मैं अपनी जुबान का बिल्कुल पक्का हूं, यदि किसी के बारे में कह दिया कि उसको सांसद या विधायक बनाना है तो बनाकर ही दम लेता हूं और किसी की टांग खींचना हो तो खींच भी लेता हूं..... निधि वितरण में यदि कोई गड़बड़ी पाई जाती है, तो किसी को भी छोडूंगा नहीं.... फालतू में नाटक मत करो, काम करो... मैं कह रहा हूं न इसीलिए करना ही है.... जनता को पानी चाहिए भाषण नहीं..... काम नहीं करोगे तो घर पर बैठा दूंगा... किसानों का सब्र अब खत्म हो चुका है.... हम बोलते नहीं करके दिखाते हैं... मैं बोतल मुंह में लगाता हूं तो खाली करके ही छोड़ता हूं ...पानी की.. मेरी आमसभाओं में कुछ लोग हाथ मिलाते समय मेरे हाथों को चूम लेते थे ,पत्नी ने भी कभी इतनी बार नहीं चूमा होगा.... आप कह रहे हैं कि दादा आपने कॉलेज तो खोल दिया लेकिन पढ़ने के लिए बच्चे तो लाओ, अरे भाई! अब मेरी उम्र हो गई है, नहीं तो सचमुच लेकर आता. आदि आदि।
अजित पवार जैसी समयबद्धता बहुत कम राजनेताओं में देखी गई है। वे वक्त के गजब के पाबंद थे। एक मिनट की देरी भी उन्हें पसंद नहीं थी। यदि उनके देवगिरी बंगले पर किसी को 8:00 बजे का समय दिया गया है और वह व्यक्ति 8:02 पर पहुंचता है तो वह व्यक्ति कितना भी बड़ा क्यों न हो ? उसे फिर से समय लेना पड़ता था। अजित पवार समय को पीछे छोड़कर आगे निकलने की कोशिश में रहते थे। उनकी पार्टी का चुनाव चिन्ह भी घड़ी था और अंत समय में जब बुरी तरह से जली हुई लाशों की पहचान नहीं हो पा रही थी तो उनके हाथ में पहनी घड़ी से ही उनकी पहचान हो पाई, क्योंकि यह खास घड़ी अजीत पवार की पहचान थी...... अलविदा दादा।
शेवाळेवाडी गांव, पुणे (महाराष्ट्र)सम्पर्क - 8850781397
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