समीक्षा :
अंतरात्मा की यात्रा है डॉ अखिलेश शर्मा की पुस्तक "शब्दशाश्वत हैं"
समीक्षक --सुरेश रायकवार
वैसे तो डॉ अखिलेश शर्मा विगत 50 वर्षों से लगातार साहित्य सृजन कर रहे है, और राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कवितायें, हाइकु, गीत, गजल, व्यंग्य अथवा चिकित्सा संबंधी लेख आदि निरंतर ही प्रकाशित होते रहते है। कोई बड़ा पुरस्कार भले ही उनके नाम नहीं हो किन्तु विभिन्न साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा उन्हे समय-समय पर सम्मानित किया जाता रहा है। पेशे से वे एक सफल शिशु-रोग चिकित्सक हैं और शायद यही कारण है कि उनके शिशु-सम सरल हृदय में साहित्य-सृजन की तरंगें भी हिलोरे लेती रहती हैं।
अभी हाल ही प्रकाशित उनकी प्रथम कृति “शब्द शाश्वत हैं” पुस्तक में उन्होने अपने जीवन के अनुभवों और रंगों को आधार बनाकर कुल 101 कविताएं प्रस्तुत की हैं, संग्रह में कुछ तुकांत तो कुछ अतुकांत कवितायें हैं साथ ही गीत, गजल, मुक्तक और हाइकु भी है। डॉ अखिलेश की पुस्तक का शीर्षक आकर्षक भी है और सत्य भी क्योंकि जैसे हमारा ब्रह्मांड शाश्वत है वैसे ही हमारे शब्द भी शाश्वत होते हैं। विज्ञान ने भी सिद्ध किया है कि हमारे द्वारा कहा गया एक-एक शब्द ब्रह्मांड में सदैव के लिए स्थापित हो जाता है। श्री संदीप राशिनकर का आवरण चित्र पुस्तक के शीर्षक के अनुरूप शीर्षक को सार्थकता प्रदान करता है।
जब आप डॉ अखिलेश शर्मा का यह कविता संग्रह पढ़ेंगे तो आप पाएंगे कि डॉक्टर सा कितने संवेनदनशील, गंभीर, चिंतनशील, दार्शनिक और सरल हैं। उनकी कविताओं में समाज की समस्याओं का खुलासा और चिंता है तो राजनीति पर प्रहार भी, वे संस्कृति के पतन पर भी लिखते हैं तो वैश्विक हिंसा की त्रासदी पर भी कलम चलाते हैं। यही नहीं जीवन-दर्शन, प्रेम और प्रकृति तथा ईश्वर भक्ति पर भी उनकी कलम ने श्रेष्ठ कविताओं की रचना की है।
पुस्तक की भूमिका में वरिष्ठ साहित्यकार डॉ पद्मासिंह ने बिलकुल सही लिखा है “डॉ अखिलेश शर्मा का प्रस्तुत काव्य-संग्रह अंतरात्मा की एक ऐसी यात्रा है, जिसमे जीवन, प्रेम, दर्शन और प्रकृति अपने मोहक रूपों में प्रकट हुए हैं।“
यदि आप केवल बड़ा नाम देखकर कविता पढ़ने का शौक रखते हैं तो बात अलग हैं, अन्यथा डॉ अखिलेश शर्मा के इस संग्रह में भी भाषा, व्याकरण, भाव और शिल्प के आधार पर अत्यंत सुघड़, सुंदर और पठनीय कवितायें प्रस्तुत की गई हैं।
संग्रह की प्रथम कविता “शब्द और पंचतत्व” को शीर्षक कविता भी कहा जा सकता है क्योंकि इस कविता में शब्द को ना केवल जीवन निरूपित किया गया है बल्कि बड़े ही सुंदर शब्दों में जीवन के लिए आवश्यक पंचतत्व भी दर्शाया गया है –
'शब्द जीवन हैं/ शब्द तैरते हैं हवा में/ ऑक्सीज़न बनकर/ शब्द प्राण वायु हैं!
शब्द ब्रह्म हैं/ शब्द विचरण करते हैं/ नभ में, अन्तरिक्ष में/ लयबद्ध! '
जीवन दर्शन पर आधारित संग्रह की कवितायें ‘जीवन एक सागर’, ‘क्यों’, ‘हे ईश्वर’, ‘जीवन’, ‘मुसाफिर’, ‘हारेगा तम’, ‘नफरत का जहर हटा’, निरंतर कर्म है कर्तव्य’, और ‘आदमी’ भी बहुत प्रभावी कवितायें हैं।
चूंकि डॉ अखिलेश एक चिकित्सक भी हैं और उन्होने कोरोना काल में आदमी के जीवन-संघर्ष को और इस त्रासदी को बहुत नजदीक से देखा है इसीलिए वे लिख सके कि –
'दीन-दुखी की अरज सुनो रे/ सीधी-सादी डगर चलो रे '
'मानव जाति पर आई विपत्ति/ एक-दूजे की मदद करो रे! '
एक और कविता ‘हे समर्पित योद्धा’ में कहते हैं –
“जीतेगी इंसानियत फिर एक जंग/ जिंदगी में भरकर हर एक रंग”।
देशवासियों में आपसी भाईचारा, प्रेम और सामंजस्य स्थापित करने के लिए कविता “बहा दो प्रेम की नदियां” अमन और शांति का संदेश देती बहुत ही सशक्त कविता है – 'करो सब बात मिल-जुल कर/ कि कोई मसला न रह जाए
बहा दो प्रेम की नदियां/ कि पानी ठहरा न रह जाए '
समाज में व्याप्त विषमताओं पर भी उनकी संवेनदनशील कलम खूब चली है। ‘किस तरह की बेबसी है’, ‘जिंदगी पूछ रही’, ‘शहर एक सवाल’, ‘शहर में’ आदि कवितायें कवि के मानवीय सरोकारों की ओर इंगित करती हैं, वहीं “प्रश्न?प्रति प्रश्न??” में दुखी होकर वे लिखते हैं –
'भूखे पेट की सलवटें/ भवनों में बिछी/ कालीनों की सलवटें?
मदहोश चुनिन्दा लोग/ सड़क किनारे/ बुलबुलाती करवटें/ कैसी विडम्बना है? '
कवि युद्ध की विभीषिका से भी आहत है इसीलिए “युद्ध! युद्ध!” में दुनिया को सचेत करते हुए लिखा है –
'बहुत हो गया/ बंद करो अब/ तांडव मौत का/ खत्म करो सब/ विश्व हो रहा है बीमार'
नकारात्मकता के इस दौर में कवि आशावादी भी है, संग्रह में ‘गलत क्या है’, समंदर जब ना समझे’, ‘दीप उजाले के’ आदि आशावादी दृष्टिकोण वाली अच्छी कवितायें है और ‘हर्ष की वीणा बजाएँ’ में तो उन्होने लिखा है –
'दुख भुलाकर हम सभी गमजदों का/ हर्ष की वीणा बजाएँ, हर्ज क्या है?
हैं विषैली सब तरफ बहती हवाएँ/ पेड़ चन्दन के लगाएँ, हर्ज क्या है? '
संग्रह में कवि ने स्त्री-विमर्श पर भी बहुत प्रभावशाली कवितायें रची हैं, बेटी, स्त्री और संतुष्टि, नदी और स्त्री, आदि कविताओं में जहां नारी का सहज और सौम्य सौंदर्य का वर्णन किया गया है तो वहीं ‘भटक रही है युवा पीढ़ी’ और ‘संस्कार’ में उन्होने युवा पीढ़ी और नारी की विकृत मानसिकता को भी उभारा हैं।
कई कवितायें है जिनमें डॉ. अखिलेश का प्रकृति प्रेम भी झलकता है। प्रकृति के रंगो को भी कवि ने बड़ी ही खूबसूरती से शब्दों में पिरोया है – इंद्र्धनुष, ऋतुराज, परिंदे, वह नदी ही तो है, इन्द्रधनुष के रंग की लकीर, गंध बांटने चला, खुशनुमा बसंत, बूंदें, एक नदी, मौसम के संग, झिलमिलाता सूरज, स्वर्णिम धूप, अमृत वर्षा आदि कविताओं में निसर्ग की रमणीयता और सौंदर्य को महसूस किया जा सकता है। कवि ने ‘रोशनी को लूटने वालों’, ‘भ्रष्टाचार मंत्र को जपकर’, ‘चाटुकारिता गूढ मंत्र है’, ‘भ्रम न पाले’, ‘भ्रष्ट आचरण धारण करके’ आदि कविताओं के माध्यम से राजनैतिक विषयों पर भी धारदार कलम चलाई है। इसके अतिरिक्त डॉ.अखिलेश शर्मा ने अपने इस संग्रह में हनुमान चालीसा को हाइकु में प्रस्तुत कर जो नवाचार किया है वह भी अत्यंत अनूठा, प्रभावी और प्रशंसनीय है।
डॉ अखिलेश शर्मा ने अपने संग्रह में क्लिष्ट शब्दावली का कम से कम उपयोग किया है उसके स्थान पर सामान्य से सामान्य पाठक के समझने योग्य हिन्दी-शब्दावली प्रयोग की गई है। यही कारण हैं कि उनकी ये कविताएं हर वर्ग के पाठक को पसंद आएगी।
कृति- “शब्द शाश्वत हैं”
कवि – डॉ अखिलेश शर्मा
प्रकाशक – संस्मय प्रकाशन
8 सी.ए.सी., ए.डी.ब्लॉक, शालीमार बाग, दिल्ली -110 088
आईएसबीएन नंबर – 978-93-93552-84-6
पृष्ठ -140
मूल्य – रु 375/-
समीक्षक
सुरेश रायकवार
152ए गोयल नगर इंदौर
मोब 88188 38007
ईमेल – sandhysur@gmail.com
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