काव्य :
गणतंत्र की 77 वीं वर्ष गांठ पर,अंचीन्हे राष्ट्र निर्माताओं को,
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ये ही राष्ट्र के आभूषण हैं
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इंजी. अरुण कुमार जैन
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जल,थल,नभ में रहते प्रतिपल,सीमा की रक्षा करते,
आँख उठी जिसकी इस भू पर, उसके प्राणों को हरते,
देह गला दे सर्दी ऐसी, तन झूलसा दे गर्मी ऐसी,
आठ प्रहर का कोई भी हो पल, सदा सजग सीमा पर यह बल.
उन्हें नमन हैं कोटि हमारे, भारत माँ के पूत ये प्यारे.
पावन,पुण्य स्मरण उनका
प्रतिदिन,पल-पल हम करते |आँख उठी...
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भारत के खेतों में सोना, श्रमार्पण से उगाते हैं,
पथरीली कठोर धरती से,
अन्न प्रभु उपजाते हैं,
देह बनी है इनकी पिंजर, तन पर वस्त्र नहीं रहते,
आभावों में स्वयं रहकर भी, पेट देश का ये भरते,
ये भी माँ के प्यारे सुत हैं,
देश भक्ति ही ये करते,
भारत भू के हर किसान को, कोटि नमन हम सब करते |आँख उठी...
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कल यंत्रो के घने शोर में, गर्मी, सर्दी लगे देह में,
आग उगलती भट्टी पल पल, सूरज तपता सिर के ऊपर,
हर वांछित उत्पादन करते,
जीवन सबका सुखमय करते,
पैर का जूता फटा हुआ है,
हाथ चोट से भरा हुआ है,
कालिख, धूल,पसीना दिनभर,काया पर रहता जीवन भर,
देश भक्त मैं कहता इनको,
हम सबकी चिंता हरते,
भारत के सब मजदूरों को, कोटि नमन हम सब करते |आँख उठी....
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अतल,गहन गहराई जाकर,
तांबा, कोयला, हीरे लाकर,
सूर्य प्रकाश कभी नहीं दिखता, ऐसा इनका जीवन रहता,
बिजली वैभव सब हम पाते, कष्ट इन्हीं के हिस्से आते.
देह शुष्क व कंठ खुश्क़ है,
बीमारी से कई ग्रस्त है,
राष्ट्र प्रगति ही लक्ष्य ह्रदय में, समृद्धि देश की इनके मन में,
देश भक्त ये पुत्र हैं माँ के, समृद्धि के सूत्र यहाँ से,
खान, खनन मजदूरों को, कोटि नमन हम सब करते| आँख उठी..
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कश्मीर से भू केरल तक, व ओखा से अरुणाचल तक,
जहाँ कोई भी श्रम करता है, राष्ट्र प्रगति में रत रहता है,
कर्तव्य, निष्ठा जिसका धन है,राष्ट्र समर्पण आभूषण है.
गाँव, गली या किसी नगर में, हिन्दू, मुस्लिम, सिख के घर में,
वे सब माँ के दिल में रहते,
देश भक्त हम उनको कहते.
शून्य, शिखर सा कोई भी हो, नमन उन्हें शत शत करते.
भारत भू के हर किसान को, इस सीमा के हर जवान को, हर श्रमिक भाई व माँ बहिनों को, लगे राष्ट्र निर्माण में हैं जो,
कोटि नमन हम सब करते. वंदन, अभिनन्दन करते.
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