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काव्य : मां की स्मृतियाँ - अंजना दिलीप दास , बसना


 

काव्य : 

मां की स्मृतियाँ


मायके की वह गली रुलाने लगती है,

बचपन जहाँ हँस-खेलकर बिताया था।

आज वही गली बेगानी लगती है,

कोई नहीं अब राह तकने वाला रहा।

बैरन बनकर यह सच बताने लगती है।


चित्त में अब भी स्मृतियों का डेरा है,

मन के कोने में माँ का प्रेम घनेरा है।

ममता की शीतल छाया नहीं रही अब,

पर माँ की स्मृति का हर पल उजियारा है।


मन को फिर से बच्चा बना जाती है,

अनायास ही होंठों पर मुस्कान सजा जाती है।

माँ की मीठी-मीठी लोरियाँ,

जब-जब याद आती हैं,

नींद नहीं—सुकून दे जाती हैं।


माँ की स्मृतियाँ मानवता सिखाती हैं,

संस्कारों की राह सत्य से मिलाती हैं।

कर्तव्य-पथ पर अडिग रहना सिखाकर,

निस्वार्थ सेवा का अर्थ बताती हैं।


माँ अब हमारे पास नहीं 

पर उसकी यादें हर साँस में बसती हैं।

जीवन की हर ठोकर पर 

“डगमगाना मत, मैं साथ हूँ।”कहती है ।


- अंजना दिलीप दास , बसना

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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